क्या वेदों में स्त्रियों को ब्रह्मा तक बनने को बोला गया हैं ?

 पूर्वपक्ष - ऋग्वेद - ८ | ३३ | १९  मंत्र के अनुसार स्त्री का ब्रह्मा तक बनना सूचित किया है। इस मंत्र के अनुसार विद्याभ्यास से अतीव विदुषी, सुसभ्य, योग्य आचरण वाली स्त्री ब्रह्मा तक बन सकती है।

उत्तरपक्ष - यह समाजी का अर्थ बनावटी है, "विद्याभ्यास से अतीत विदुषी” आदि शब्द समाजी ने मन्त्रार्थ में प्रक्षिप्त किए हैं; जिनके पद मन्त्र में नहीं हैं। उक्त मंत्र तो स्त्री को उपदेश दे रहा है कि "नीचे देख, ऊपर न देख। पैरों को ठीक ठीक रख । तेरे अदृष्टव्य दो अङ्ग न दिखें"। यहाँ पर मध्यम-पुरुष इस अर्थ का साक्षी है। जब स्त्री को उपदेश का प्रकरण चला हुआ है; तब "विदुषी स्त्री ब्रह्मा तक बन सकती है” यह अर्थ यहाँ असम्बद्ध हो जाता है, क्योंकि - तू नीचे देख कर चल, ऊपर न देख, इससे तू ब्रह्मा बन जाएगी; क्या इसमें कोई उपपत्ति है ? सर्वथा नहीं। समाजी लोग यह अर्थ करते हैं या घास काटते हैं ? इस मंत्र का अर्थ आर्यसमाजी पण्डित श्रीपाददामोदर सातवलेकर ने आर्यप्रतिनिधि सभा पंजाब द्वारा दयानन्द-शताब्दी के समय ऋषितर्पणार्थ प्रकाशित वेदामृत पुस्तक (प्रथम संस्करण) जिसे उस समय आर्यप्रतिनिधि सभा ने भी स्वीकृत किया था, देखिए उसमें प्रकाशक का निवेदन में इस प्रकार कहा है - “ब्रह्मा (आत्मा ही स्त्री रूप से तेरे अंदर) प्रकट हुआ है” यह लिखकर वे बताते हैं कि 'वस्त्र से अपने अवयव अच्छी प्रकार से आच्छादित रखें, ताकि कोई अवयव दूसरे को दिखायी ना दे। यह समझे कि अपने अंदर आत्मा ही स्त्री का रूप धारण करके अवतीर्ण हुआ है'।

उक्त मंत्र में न यज्ञ का प्रकरण है, न यज्ञ शब्द ही है; स्त्री को “नीचे देखकर चल, ऊपर देख के नहीं, इससे स्त्री ब्रह्मा बन जाती है”, इसमें उपक्रम एवं उपसंहार की एकता भी नहीं है। तब समाजियों का अपना इष्ट अर्थ करना श्रुति से बलात्कार करना है। तब समाजियों ने स्त्री के यज्ञ का ब्रह्मा अर्थ ही कैसे कर लिया ? जब स्त्री को नीची आँखों से देखने का आदेश दिया गया है; और उसके विशेष अङ्ग न दिखें, यह आदेश दिया गया है। तब यह स्त्री यज्ञ का ब्रह्मा भी बन सकती है - यह “स्त्री” यहाँ सङ्गत ही कैसे हो सकता है ? आश्चर्य है कि - समाजी अपने पक्ष की सिद्धि में गलत अर्थ लिखने में भी परमात्मा से नहीं डरते। वास्तव में यहाँ प्राकरणिक अर्थ अन्य है, जिसे श्रीसायणाचार्य ने स्पष्ट किया है। प्लायोगि-आसङ्ग नामक एक पुरुष जो इस सूक्त के ऋषि (दृष्टा) मेधातिथि को धन देने वाला था, वह आंतरिक कारणवश स्त्री बन गया था। उसे इन्द्र की ओर से यह आदेश दिया गया है, निमित्त उसी का है, पर उससे अन्य स्त्रियों को उपदेश दिया जा रहा है।

देखिए इसपर श्रीसायणाचार्य के शब्द - 'मेधातियेर्धनदाता प्लोयोगिरासङ्गः स पुमान् भूत्वा स्त्री अभवत्' (ऋग्वेद - ८ | ३३ | १७) इसका भाव पहले लिखा जा चुका है। इस बात को समाजी गप्प भी नहीं कह सकते। ऐसी घटनाएँ प्रत्यक्ष भी घट रही हैं। उक्त मंत्र की व्याख्या में श्रीपाद दामोदर सातवलेकर ने भी अपने मेधातिथि ऋषि के दर्शन (पृष्ठ ७२) में लिखा है - 'इस अंतिम मंत्र में "ब्रह्मा स्त्री बभूविथ" में ब्रह्मा का कार्य करने वाला पुरुष, स्त्री बनी थी - ऐसा कहा है। उक्त मंत्र में पहले पुरुष था, उसकी स्त्री बनी, और पश्चात् वह पुरुष बना होगा। वह कैसे हुआ, इसका पता लगाना चाहिए। ऋग्वेद - ८ | १ | ३४ - यहाँ पुनः पुरुषत्व की प्राप्ति होने का विधान है। उस प्लायोगि को इंद्र उपदेश देता है। इसको श्रीसायणाचार्य के शब्दों में देखिए - अन्तरिक्षाद्..... स्त्री बभूविथ अर्थात् तुम समझदार पुरुष होते हुए भी स्त्री बन गयी हो; अतः अपने वस्त्र ठीक ठीक पहनो, जिससे तुम्हारा पर्दा बना रहे। अब मध्यम पुरुष का अर्थ ठीक घट गया। मन्त्रार्थ समन्वित भी हो गया। समाजियों का किया हुआ मन्त्रार्थ सर्वथा असम्बद्ध ही है। कहाँ वो मंत्र के उपक्रम में स्त्री के लिए पर्दे का उपदेश चला हुआ था और कहाँ उपसंहार में समाजियों का किया हुआ यह असम्बद्ध अर्थ आ पड़ा कि - 'ऐसा आवरण (पर्दा) करनेवाली स्त्री यज्ञ का ब्रह्मा तक बन जाती है'। क्या यहाँ मंत्र के उपक्रम तथा उपसंहार में कोई एकवाक्यता दिख रही है ? यह है इन लोगों का हाल कि -अपने गलत पक्ष को सिद्ध करने के लिए स्त्री हि ब्रह्मा शब्द देखते ही स्त्री को यज्ञ के ब्रह्मा बनाने का स्वप्न देखने लगे। इसके साथ वाले मंत्र ऋग्वेद ८ | ३३ | १७ में स्त्री के मन का काबु होना कठिन तथा उसकी बुद्धि को लघु छोटा बताया है। यहाँ लघु के 'ल' का 'र' हो गया है। यहाँ समाजियों का रघु की तरह 'श्रुतस्य... कोऽन्तं' यह अर्थ करना भी उचित नहीं क्योंकि - मंत्र में रघु कोई नाम नहीं, किन्तु बुद्धि का विशेषण है; तब अर्थ होगा कि स्त्री की बुद्धि चंचल होती है। जैसा कि ऋग्वेद - १० / ९५ / १५ मंत्र भी साक्षी है इस बात का। इसी को अनुसृत करके कौटिल्यार्थ शास्त्र - चाणक्य सूत्र में भी लिखा है- स्त्रियों का मन क्षणिक (अस्थिर, चंचल) होता है। यह वेद की विचारधारा है। इसे मध्यकाल की विचारधारा कहना स्त्रियों के भक्तों का व्याजमात्र है। यहाँ स्त्री की बुद्धि को छोटा व चंचल बताकर उल्टा वेद ने उसे ब्रह्मा होने के अयोग्य सिद्ध कर दिया है। आशा है कि समाजी लोग श्रुति के अर्थों का अनर्थ और उनमें बनावट करके श्रुति बलात्कार करने के पापी ना बने।

अब दूसरे तरीके से इस आक्षेप के ऊपर एक और खंडन प्रस्तुत करने वाला हु।

2. क्या ऋग्वेद 8/33/19 में स्त्रियों को ब्रह्मा बोला गया है ?

उत्तरपक्ष: कुछ लोग बिना संदर्भ और व्याकरण जाने ही कुछ भी कहे देते हैं पूरा संदर्भ क्या है आए समझते हैं, प्लायोगि-आसंग नामक एक पुरुष, जो ऋषि मेधातिथि का धनदाता था इसकी पुष्टि सायण भाष्य ऋग्वेद 8/33/17 "मेधातिथेर्धनदाता प्लायोगि-रासङ्गः स पुमान् भूत्वा स्त्री अभवत्" से हो जाती है।

अब ये किसी विशेष कारणवश स्त्री बन गया, जब वह स्त्री के रूप में रहने लगा तो इन्द्र देवता रथ में आकर उसे उपदेश देने लगे और कहा कि अब जब तुम स्त्री हो, तो स्त्रियों के अनुसार आचरण करो।

जैसे नीचे देखना, ऊपर न देखना, पैरों को सटाकर शालीनता से चलना, शरीर को अच्छी तरह ढंकना और मर्यादित कपड़े पहनना उन्होंने यह भी कहा कि तुम्हारा आचरण पुरुषों जैसा नहीं होना चाहिए। ऋग्वेद 8/33/19 मंत्र के अंत में "ब्रह्मा स्त्री बभूविथ" में ब्रह्मा का कार्य करने वाला पुरुष स्त्री बनी थी ये अर्थ है इसीलिए सायन भाष्य में भी "हि यस्मात् कारणात् ब्रह्मा सन् स्त्री बभूविथ" इष्ट है और गधों को लग रहा है कि स्त्री को ब्रह्मा बोला जा रहा है।

गंगा सहाय शर्मा जी ने इसका अनुवाद इस प्रकार से किया हैं।

हि ब्रह्मा बभूविथ' इस पद का व्याकरणिक अर्थ है 'तुम ब्रह्मा बन गए हो' (बभूविथ = भू धातु, लिट्लकारः, मध्यम पुरुष एकवचन)
यहाँ 'ब्रह्मा' शब्द का अर्थ 'स्तोता' या 'यज्ञकर्मी' है न कि सृष्टिकर्ता देव ब्रह्मा संस्कृत व्याकरण में 'हि' अव्यय तीन तरह से उपयुक्त होता है

1. अवधारण।

2. कारण।

3. पादपूर्ण।

सायण आचार्य ने भाष्य में "हि यस्मात् कारणात् ब्रह्मा सन् स्त्री बभूविथ" से इसको कारण प्रयोग में सिद्ध कर दिया इसमें 'ब्रह्मा' ज्ञानी पुरुष को संकेतित किया है और वह स्त्री बन गया।

इन लोगों को संस्कृत का ज्ञान तो होता नहीं तो हम ही, कर देते है [हि] क्योंकि (कारणवाचक अव्यय) [यस्मात् कारणात्। जिस कारण से [ब्रह्मा सन्] ब्रह्मा होकर [स्त्री बभूविथ] तुम स्त्री बनीं।

संस्कृत में सन् कृदन्त 'होकर या होता हुआ' के लिए प्रयोग किया जाता है 'होता/होती है' के लिए नहीं इसीलिए ये सामान्य स्त्रियों के लिए इस संदर्भ में बोलना असंभव है जैसे मै कहूं 'नरः सन् राजा बभूव' अर्थात पुरुष होकर भी वह राजा बना।

यहां पर अगर स्त्री ब्रह्मा पहले से ही थी तो उसको दुबारा ब्रह्मा बोलने का कोई तर्क नहीं बनता इसीलिए यहां ब्रह्मा उस पुरुष को बोला जा रहा है जो अब स्त्री बन गया। अब यह मत बोल देना कि हम सायण आचार्य को नहीं मानते क्योंकि तुमने प्रमाण भी वही से दिया था।

पुल्लिंग में सन् होने से एक बात सिद्ध हो जाएगी की सन् प्रत्यय एक पुरुष के लिए बोला था और वही ब्रह्मा भी था तो स्त्री को ब्रह्मा नहीं बोला गया हे वरना सती का व्यवहार होता।

तसल्ली के लिए आचार्य वेंकट का भाष्य भी देख लो। सायण भाष्य में लिखा हे वह समझदार पुरुष होकर भी स्त्री बन गया इसका तात्पर्य प्रशंसनीय न होकर निंदनीय है क्योंकि भाव के अनुसार समझदार केवल पुरुष ही हो सकते हैं। यदि यह श्लोक वास्तव में स्त्री के ब्रह्मा बनने की अनुमति देता तो इन्द्र उसे संयम, दृष्टि और शील का उपदेश क्यों देता ? यह स्वयं सिद्ध करता है कि प्रसंग अधिकार का नहीं बल्कि मर्यादा का है "मा उपरि पश्य" और "मा ते कशप्लको दृशन्तु" जैसे वाक्य शील और संयम का निर्देश देते हैं न कि किसी विधि या समानाधिकार का क्योंकि इस मंत्र का संबंध यज्ञ करने वाले ब्रह्मा (पुरोहित) से है तो जब स्त्री पुरोहित ही नहीं बन सकती (मनुस्मृति 11/36) तो यज्ञ की ब्रह्मा कैसे बन सकती है ?

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