अक्सर अष्टाध्यायी के सूत्रों का गलत संदर्भ लेकर यह दावा किया जाता है कि व्याकरण के भाषाई सरलीकरण के नियम स्वतः ही धार्मिक अधिकारों या प्रतिबंधों को भी बदल देते हैं, इस आलेख में हम पाणिनीय सूत्र 1.2.67 तथा 1.2.68 के वास्तविक भाषाई निहितार्थों की समीक्षा करेंगे, तथा यह स्पष्ट करेंगे कि व्याकरण की मर्यादा और धर्मशास्त्रों के विधान में क्या मूलभूत अंतर है
1. पाणिनीय सूत्र 1.2.67 (पुमान् स्त्रिया) और 'ब्राह्मण' शब्द की समीक्षा
अष्टाध्यायी के सूत्र 1.2.67 (पुमान् स्त्रिया) के अनुसार, जब किसी पुल्लिंग शब्द और उसके समान प्रकृति वाले स्त्रीलिंग शब्द का एक साथ प्रयोग किया जाता है, और उनके मध्य केवल लिंग का अंतर होता है, तब 'एकशेष' नियम लागू होता है। इस प्रक्रिया में स्त्रीलिंग शब्द लुप्त (विलीन) हो जाता है और केवल पुल्लिंग शब्द शेष बचता है
सूत्र व्याख्या : पुमान् स्त्रिया एकशेषः अर्थात जब पुल्लिंग और स्त्रीलिंग का सह-प्रयोग हो, तो केवल पुल्लिंग रूप ही अवशिष्ट रहता है, लेकिन वह दोनों का बोध कराता है
उदाहरण स्वरूप -
ब्राह्मणः च ब्राह्मणी च = ब्राह्मणौ
यहाँ 'ब्राह्मण' (पुरुष) और 'ब्राह्मणी' (स्त्री) दोनों को सम्मिलित रूप से दर्शाने के लिए द्विवचन प्रत्यय 'औ' लगकर 'ब्राह्मणौ' शब्द बनता है। भाषिक और व्याकरणिक रूप से यहाँ स्त्रीलिंग रूप विलोपित हो गया है, किंतु यह द्विवचन रूप दोनों का प्रतिनिधित्व करता है
एकल प्रयोग का नियम - यदि किसी शास्त्र, सूक्त या वाक्य में 'ब्राह्मणः' शब्द अकेले (एकवचन में) प्रयुक्त हुआ हो, तो उसका तात्पर्य केवल और केवल 'ब्राह्मण पुरुष' से होता है। उस एकल प्रयोग के अंतर्गत 'ब्राह्मणी' (स्त्री) स्वतः सम्मिलित नहीं मानी जा सकती
2. वेदों में 'भ्रातृ' और 'पुत्र' शब्द का एकशेष नियम
इसी प्रकार का भ्रम वेदों और संहिताओं में आने वाले 'पुत्र' या 'भ्रातृ' शब्दों को लेकर भी फैलाया जाता है, कुछ व्याख्याकार अल्पज्ञान वश यह तर्क देते हैं कि वेदों में जहाँ भी एकल 'भ्राता' या 'पुत्र' शब्द आया है, वहाँ 'बहन' या 'पुत्री' को भी ग्रहण कर लेना चाहिए, पाणिनीय व्याकरण इस तर्क का पूर्णतः खंडन करता है
व्याकरण नियमानुसार, जब 'भ्रातृ' (भाई) शब्द 'स्वसृ' (बहन) के साथ आता है, या 'पुत्र' शब्द 'दुहितृ' (पुत्री) के साथ आता है, तब द्वंद्व समास में केवल पहला शब्द (पुल्लिंग) शेष रहता है और दूसरे (स्त्रीलिंग) का लोप हो जाता है
भ्राता च स्वसा च (भाई और बहन) अब यहां 'स्वसा' का लोप होने से सिर्फ भ्राता शेष रहेगा तब अंतिम रूप इश्क़ द्विवचन होने के कारण भ्रातरौ बनेगा जिसका अर्थ दोनो ग्रहण किआ जायेग ( भाई और बहन दोनों )
इसी प्रकार -
पुत्रः च दुहिता च (पुत्र और पुत्री) दुहिता' का लोप, 'पुत्र' शेष तो बनेगा पुत्रौ ( पुत्र और पुत्री दोनों )
इस बात को अमरकोश मे भी बताया गया हे जहाँ लिखा हे की -
बेटा बेटी के संयुक्त नाम को पुत्रौ बोलते हे
तथा भाई बहन के संयुक्त नाम को भ्रातरौ
अतः वैदिक ऋचाओं या संहिताओं में जहाँ 'भ्रातरी' या 'पुत्री' (द्विवचन) शब्द दिखाई देगा, केवल वहीं स्त्री और पुरुष दोनों का ग्रहण न्यायसंगत है। यदि वेद में केवल एकल रूप 'पुत्रः' या 'भ्राता' लिखा है, तो वहाँ पुत्री या बहन का अर्थ निकालना सर्वथा व्याकरण-विरुद्ध और भ्रामक है।
निष्कर्ष : सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझना है कि आचार्य पाणिनि का व्याकरण शास्त्र केवल भाषा की मर्यादा, शब्दों की शुद्धि और वाक्य विन्यास का निर्धारण करता है, यह समाज के धार्मिक कर्तव्यों, अधिकारों या निषेधों का निर्धारण नहीं करता। धार्मिक कृत्यों और संस्कारों का विधान पूरी तरह से धर्मशास्त्रों (जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति) और गृह्यसूत्रों के माध्यम से संचालित होता है। इन शास्त्रों में स्पष्ट रूप से निर्देश दिए गए हैं कि कौन से संस्कार किसके लिए विहित हैं, उपनयन (यज्ञोपवीत धारण) यह विशिष्ट संस्कार धर्मशास्त्रों में केवल द्विजाति पुरुषों के लिए ही निर्दिष्ट किया गया है, वेदाध्ययन (शास्त्रचर्चा एवं वेद पाठ) इसके लिए भी स्मृतियों में विशिष्ट नियम और पात्रता निर्धारित हैं। अग्निहोत्र (नित्य वैदिकाग्नि कर्म) स्मृतियों के अनुसार, स्वतंत्र रूप से मुख्य अग्निहोत्र कर्म के संपादन का अधिकार स्त्रियों के लिए प्रतिबंधित या विशिष्ट नियमों के अधीन माना गया है, व्याकरण के 'एकशेष' नियम (जैसे ब्राह्मणौ या पुत्रौ) का सहारा लेकर यह तर्क देना कि धार्मिक संस्कारों में स्त्रियों को भी वही अधिकार प्राप्त हैं जो पुरुषों को हैं, सर्वथा अनुचित है।





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