क्या वाल्मीकि रामायण का उत्तरकाण्ड अप्रामाणिक है ?

भारतीय धार्मिक एवं साहित्यिक परंपरा में रामायण का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण न केवल श्रीराम के जीवन का आख्यान है, बल्कि भारतीय संस्कृति, धर्म, समाज और साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण आधारशिला भी है। किंतु रामायण के विभिन्न काण्डों में उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता को लेकर लंबे समय से विवाद होता रहा है।

आजकल आपने भी यह कथन अवश्य सुना होगा कि उत्तरकाण्ड मूल वाल्मीकि रामायण का हिस्सा नहीं है, बल्कि बाद में जोड़ा गया एक प्रक्षिप्त अंश है। यह मत विशेष रूप से कुछ नवहिंदू विचारकों, आर्य समाजियों तथा अन्य रामायण-पाठ के आलोचकों के बीच प्रचलित है। इसी क्रम में जगद्गुरु रामभद्राचार्य जैसे विद्वानों के विचारों के संदर्भ में भी उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता पर चर्चा देखने को मिलती है।

उत्तरकाण्ड को अप्रामाणिक सिद्ध करने के लिए अनेक तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं परंतु, क्या वास्तव में उत्तरकाण्ड प्रामाणिक नहीं है? आइए, शास्त्रीय साक्ष्यों, परंपरा, क्रिटिकल एडिशन और ऐतिहासिक आचार्यों के संदर्भों के आधार पर इन दावों का निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं। 

1) फलश्रुति और उत्तरकाण्ड : 'फलश्रुति' वाले भ्रम का निवारण

उत्तरकाण्ड को अप्रामाणिक सिद्ध करने के लिए सबसे पहला तर्क यह दिया जाता है कि युद्धकाण्ड के अंत में फलश्रुति (काव्य पढ़ने का फल) आ जाती है, और जहाँ फलश्रुति आ जाए, वहीं काव्य का अंत मान लिया जाता है।

यह तर्क पूरी तरह से निराधार और अज्ञानतापूर्ण है। भारतीय संस्कृत साहित्य और पुराण-शास्त्र में फलश्रुति का अर्थ किसी कथा का अंतिम समापन ही नहीं होता, बल्कि यह किसी बड़े वृत्तांत या महान घटना के संपन्न होने पर भी दी जाती है। इसके प्रत्यक्ष उदाहरण निम्नलिखित हैं:-


बालकाण्ड में फलश्रुति:- वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में ही फलश्रुति का वर्णन आ जाता है। यदि फलश्रुति पर ही ग्रन्थ समाप्त हो जाता, तो क्या रामायण बालकाण्ड में ही समाप्त मान ली जानी चाहिए?

महाभारत कर्णपर्व में फलश्रुति:- वेदव्यास रचित महाभारत के कर्णपर्व (अध्याय ९९) में भी फलश्रुति का स्पष्ट वर्णन है। परंतु महाभारत इसके बाद भी जारी रहता है और इसके कई पर्व (शल्य, सौप्तिक, स्त्री, शांति, अनुशासन आदि) आगे आते हैं।

अतः केवल फलश्रुति का आ जाना उत्तरकाण्ड के अप्रमाणिक होने का सिद्धान्त नहीं बन सकता।

2) क्रिटिकल एडिशन और प्राचीन संस्करणों का दोहरा मानदंड

आर्य समाज और आधुनिक शोधकर्ता भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI) द्वारा तैयार किए गए क्रिटिकल एडिशन (Critical Edition) को अत्यंत प्रामाणिक मानते हैं। क्रिटिकल एडिशन का सिद्धांत यह है कि जो पाठ देश भर की हस्तलिखित पांडुलिपियों में समान रूप से मिलता है, उसे ही मूल स्वीकार किया जाता है।

क्रिटिकल एडिशन की स्वीकृति: BORI द्वारा निर्मित क्रिटिकल एडिशन भी उत्तरकाण्ड को रामायण के प्रामाणिक और सातवें काण्ड के रूप में स्वीकार करता है। जब उनका ही पसंदीदा क्रिटिकल एडिशन इसे मानता है, तो फिर इसे नकारने का आधार क्या है?

बंगाल संस्करण का विरोधाभास: जब भी सीता के बाल-विवाह जैसे किसी श्लोक पर चर्चा होती है, तो आर्य समाज तुरंत यह तर्क देता है कि यह श्लोक सबसे प्राचीन माने जाने वाले 'बंगाल संस्करण' में उपलब्ध नहीं है। अर्थात्, यहाँ वे 'प्राचीनता' को सत्यता की कसौटी मानते हैं। परंतु वही प्राचीन बंगाल संस्करण उत्तरकाण्ड को रामायण का पूर्ण और अभिन्न अंग स्वीकार करता है। यह दोहरा रवैया उनके तर्कों के विरोधाभास को स्पष्ट करता है।

3) स्वयं वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड) के आंतरिक साक्ष्य

यदि उत्तरकाण्ड बाद की मिलावट होता, तो महर्षि वाल्मीकि स्वयं रामायण के प्रारंभ में इसका उल्लेख कभी न करते। बालकाण्ड में स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं:-

"चतुर्विंशत्सहस्राणि श्लोकानामुक्तवानृषिः। तथा सर्गशतान् पञ्च षट्काण्डानि तथोत्तरम्॥"

(बालकाण्ड १/४/२)

अर्थात्: महर्षि वाल्मीकि ने उत्तरकाण्ड सहित कुल २४,००० श्लोक, ५०० सर्ग और ६ काण्डों के अतिरिक्त उत्तरकाण्ड की रचना की।

इसके तुरंत बाद अगले ही श्लोक में आता है:-

कृत्वा तु तन्महाप्राज्ञः सभविष्यं सहोत्तरम्। चिन्तयामास को न्वेतत् प्रयुञ्जीयादिति प्रभुः

(बालकाण्ड १/४/३)

अर्थात्: भविष्य की घटनाओं और उत्तरकाण्ड सहित समस्त रामायण की रचना पूर्ण कर लेने के पश्चात् महर्षि वाल्मीकि ने विचार किया कि इस महाकाव्य को जनसमुदाय तक कौन पहुँचा सकता है। 

ये दोनों श्लोक स्पष्ट करते हैं कि उत्तरकाण्ड रामायण की रचना का अभिन्न हिस्सा था। (और यह श्लोक क्रिटिकल एडिशन में भी हैं)।

4) महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत का प्रमाण

क्या उत्तरकाण्ड की घटनाओं का उल्लेख रामायण के बाहर भी मिलता है? जी हाँ। महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत में उत्तरकाण्ड की कथाओं का स्पष्ट उल्लेख है:-

(महाभारत, शांतिपर्व १२/१५३/६७)

इस श्लोक में स्पष्ट लिखा है कि श्रीराम ने जब तपस्यारत शम्बूक का वध किया, तब एक मृत ब्राह्मण बालक पुनः जीवित हो उठा। शम्बूक वध की यह घटना केवल उत्तरकाण्ड में ही वर्णित है। महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथ में इस घटना का होना सिद्ध करता है कि उत्तरकाण्ड वेदव्यास जी के काल में भी पूर्णतः प्रामाणिक और स्वीकृत था।

5) आचार्यों और परंपरा के ऐतिहासिक प्रमाण

(अ) आचार्य कुमारिल भट्ट और तंत्रवार्तिक का साक्ष्य

परंपरा और आर्य समाज के अनुसार आदि शंकराचार्य 2500वर्ष पूर्व हुए और उनके समकालीन आचार्य कुमारिल भट्ट हुए। तो आचार्य कुमारिल भट्ट ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'तंत्रवार्तिक' में उत्तरकाण्ड की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया है- जैसे माता सीता का परित्याग और यज्ञ के समय स्वर्ण की सीता को पास बैठाना।

बौद्ध विद्वानों ने इन घटनाओं को लेकर जो आक्षेप उठाए थे, आचार्य कुमारिल भट्ट ने उनका उत्तर दिया। यदि उत्तरकाण्ड रामायण का भाग न होता या किसी अनधिकृत व्यक्ति की मिलावट होता, तो कुमारिल भट्ट बौद्धों को सीधा उत्तर देते कि "यह तो मूल रामायण का भाग ही नहीं है, केवल एक पौराणिक कल्पना है।" परंतु उन्होंने ऐसा न करके उत्तरकाण्ड की घटनाओं का बचाव किया, जिससे सिद्ध होता है कि उनके काल में उत्तरकाण्ड निर्विवाद रूप से प्रामाणिक था।

( ब ) महाकवि कालिदास का 'रघुवंशम्'


लगभग २००० वर्ष पूर्व हुए महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य 'रघुवंशम्' के १४वें और १५वें सर्ग में उत्तरकाण्ड की घटनाओं (सीता-परित्याग, लव-कुश का जन्म, शम्बूक प्रसंग और श्रीराम का महाप्रस्थान) का विस्तार से वर्णन किया है। प्राचीन आचार्य संदर्भ कोट करने के बजाय कथा का सीधा वर्णन करते थे। कालिदास जैसे महान कवि द्वारा इसका वर्णन करना उत्तरकाण्ड की अटूट प्रामाणिकता को दर्शाता है।

निष्कर्ष

उपरोक्त सभी प्रमाणों के सूक्ष्म अध्ययन से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि:- 

1) फलश्रुति का तर्क असत्य है, क्योंकि बालकाण्ड और महाभारत में भी मध्य में फलश्रुति आती है।

2) क्रिटिकल एडिशन और प्राचीन पांडुलिपियाँ (जैसे बंगाल संस्करण) उत्तरकाण्ड को रामायण का भाग स्वीकार करती हैं।

3) वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में उत्तरकाण्ड का स्पष्ट अग्रिम उल्लेख मौजूद है।

4) महाभारत, कालिदास का रघुवंशम्, और कुमारिल भट्ट का तंत्रवार्तिक इस बात के प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं कि उत्तरकाण्ड प्राचीन काल से ही प्रामाणिक माना जाता रहा है।

उत्तरकाण्ड को केवल इसलिए अप्रामाणिक कह देना कि उसमें वर्णित कुछ प्रसंग आधुनिक दृष्टिकोण या व्यक्तिगत विचारधारा के अनुकूल नहीं बैठते, एक कपोल-कल्पित और अज्ञानतापूर्ण कदम है। उत्तरकाण्ड महर्षि वाल्मीकि रचित मूल रामायण का ही एक प्रामाणिक, प्राचीन और अविभाज्य अंग है।

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