क्या याज्ञवल्क्य ऋषि गौ मांस खाने को नहीं बोले थे ? शतपथ ब्राह्मण 3.1.2.21 का सम्पूर्ण खंडन


कुछ लोग महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा प्रतिपादित वचनों (शतपथ ब्राह्मण 3.1.2.21) की मनमानी व्याख्या करके गोमांस भक्षण का खण्डन करने का प्रयास करते हैं। इसके लिए प्रायः पारम्परिक या विशिष्ट संस्थाओं द्वारा तैयार किए गए घिसे-पिटे तर्कों और व्याख्याओं (टूलकिट) का सहारा लिया जाता है। आज हम उपलब्ध मूल ग्रन्थों, भाष्यों और संदर्भों के आधार पर इस मत का पूर्णतः और समूल खण्डन करेंगे। 

नविन व्याख्याकारों का मत है कि यहाँ 'लुप्त तद्धित प्रक्रिया' के अनुसार 'धेनु' (गौ) शब्द से तात्पर्य गाय से उत्पन्न दूध, दही, मलाई आदि पदार्थों से है, और 'अनुडुह' (बैल) शब्द से तात्पर्य बैल के माध्यम से कृषि द्वारा उत्पन्न खाद्य वस्तुओं (अन्न आदि) से है। उनके अनुसार, जब कोई यज्ञ-दीक्षित यजमान उपवास पर हो, तब उसे इन विशिष्ट पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। इस पक्ष के समर्थन में वे सायणाचार्य के भाष्य का भी आधा-अधूरा उल्लेख करते हैं।

इस संदर्भ में महर्षि याज्ञवल्क्य के विरोधी वचन के मुख्य रूप से तीन संभावित अर्थ गढ़े जाते हैं

1. पहला तर्कः उपवास का नियम केवल यजमान के लिए है। चूँकि याज्ञवल्क्य पुरोहित (ऋत्विज) हैं, इसलिए वे 'अंसल' खा सकते हैं क्योंकि वे उपवास के नियमों से आबद्ध नहीं हैं।

2. दूसरा तर्कः यज्ञ अनुष्ठान के दौरान दीर्घकाल तक उपवास करने से यजमान अत्यधिक दुर्बल हो जाएगा, अतः शरीर को सुदृढ़ रखने के लिए यजमान या उनके प्रतिनिधि के रूप में याज्ञवल्क्य 'अंसल' का सेवन कर सकते हैं। यहाँ 'अंसल' का अर्थ बलकारक पदार्थ जैसे रबड़ी, मलाई, फल या मेवे निकाला जाता है, न कि मांस।

3. तीसरा तर्कः गाय और बैल से प्रत्यक्ष प्राप्त होने वाले दूध-अन्न आदि का निषेध होने के कारण, यजमान केवल शरीर की पुष्टि के लिए अन्य फल, मेवे आदि (जो सीधे धेनु या अनुडुह से जुड़े न हों) खा सकता है 

उपर्युक्त तीनों व्याख्याएँ पूर्वापर (आगे-पीछे के) प्रसंगों और मूल संस्कृत व्याकरण के सर्वथा विपरीत हैं। इसका विस्तृत शास्त्रीय खण्डन निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट होता है 

1. पूर्वपक्ष का संदर्भ (Context) खुद ही मांस की ही पुष्टि करता है देखे - 

शतपथ ब्राह्मण के मूल पाठ में पूर्वपक्षी स्पष्ट रूप से कहता है कि गाय और बैल का मांस नहीं खाना चाहिए, क्योंकि ये दोनों पशु इस संपूर्ण जगत को धारण करते हैं। देवताओं ने भी अन्य प्राणियों के वीर्य और पराक्रम को गाय और बैल में स्थापित किया है। पूर्वपक्षी तर्क देता है कि जो कोई इनका मांस खाता है, वह मानो सबका विनाश करता है, वह पापी और कीर्तिहीन होता है तथा परलोक में अधम योनि को प्राप्त करता है। यहाँ पूर्वपक्षी गाय और बैल के भौतिक शरीर और उनके महत्व की बात कर रहा है। यदि विषय केवल दूध या साधारण अन्न का होता, तो 'संसार का समूल नाश' या 'गर्भहत्या' जैसे भयंकर पापों का उल्लेख सर्वथा असंगत होता। अतः स्पष्ट है कि यहाँ मूल विवाद मांस भक्षण को लेकर ही है, जिसे मुर्ख व्याख्याकार जानबूझकर अनदेखा करते हैं। 

2. 'पुरुषधर्म' बनाम 'क्रतुधर्म' का अकाट्य प्रमाण से गौ मांस भक्षण सिद्धि 

नविन व्याख्याकारों का यह कहना कि निषेध केवल दीक्षित यजमान के लिए है, पूर्णतः मिथ्या है। सायणाचार्य ने अपने भाष्य में कात्यायन श्रौतसूत्र (7.2.24) "पुरुषधर्मो वासम्भवात्" के प्रमाण को भी उद्धृत किया है जिसके अनुसार पूर्वपक्ष कहता है कि सभी मनुष्यों के लिये गोमांस खाने का निषेध है, लेकिन अगले सूत्र में कहा गया है कि "अंसलभोजनं वा" अर्थात् नर्म/चर्बीदार गाय या बैल का मांस खा सकते हैं। भला पूर्वपक्षी सभी मनुष्यों को दूध आदि खाने के लिये निषेध क्यों करेगा? इसके अतिरिक्त, कात्यायन श्रौतसूत्र (7.4.20) में स्पष्ट विधान है कि यजमान पयोव्रत (दूध का सेवन) कर सकता है। जब दूध पीने की स्पष्ट अनुमति है, तो फिर दूध-मलाई का विवाद खड़ा करना केवल सत्य को छिपाना है। इसके प्रसिद्ध भाष्यकार कर्काचार्य ने भी यहाँ स्पष्ट रूप से 'मांस' शब्द का ही उल्लेख किया है।

कात्यायन श्रौतसूत्र का मुख्य सिद्धांतः पूर्वपक्ष के निषेध सूत्र (7.2.23) के ठीक बाद अगला सूत्र (7.2.25) कहता है "अंसलभोजनं वा"। अर्थात्, विकल्प के रूप में अंसल (पुष्ट/चर्बीदार) गाय या बैल का मांस खाया जा सकता है। 

3. 'अंसल' शब्द का वास्तविक और प्रामाणिक अर्थ

तथाकथित व्याख्याकार 'अंसल' का अर्थ रबड़ी-मलाई आदि करके हास्यास्पद तर्क देते हैं। व्याकरण और कोश ग्रन्थों के अनुसार यह अर्थ सर्वथा अशुद्ध है। शतपथ ब्राह्मण (3.8.4.5-6) में 'अंसल' शब्द का प्रयोग सीधे पुष्टांग या मोटे पशु के लिए हुआ है, जहाँ इसकी तुलना 'कृश' (दुबले-पतले पशु) से करके स्पष्ट अंतर दिखाया गया है। सायणाचार्य भी इसका अर्थ "पुष्टांग" (मोटा-ताजा) करते हैं। अमरकोश (2.6.44) में भी अंसल को मांसल अंगों से युक्त ही बताया गया है।

कात्यायन श्रौतसूत्र के भाष्य में कर्काचार्य ने 'अंसल' का अर्थ स्पष्ट शब्दों में 'पीवा/स्थूल' (चर्बीदार या मांसल) किया है। इसके अतिरिक्त, सायणाचार्य द्वारा उद्धृत आपस्तम्ब श्रौतसूत्र (18.3.9) के अनुसार, एक से पांच वर्ष की आयु के पशुओं की अवस्था का निर्धारण मांस की कोमलता के संदर्भ में ही किया गया है। अतः याज्ञवल्क्य का यह कथन कि "अश्नाम्येवाहमंसलं चेद्भवति" का वास्तविक अर्थ यही है कि - मैं तो (गोमांस) अवश्य खाता हूँ, बशर्ते वह अंसल (नर्म, पुष्ट या चर्बीदार) हो।

अन्य प्राचीन धर्मसूत्रों से पुष्टि - 

महर्षि याज्ञवल्क्य के इस मत की पुष्टि अन्य समकालीन और परवर्ती प्रामाणिक शास्त्रों से भी होती है-

आपस्तम्ब धर्मसूत्र (1.5.17.30-31): इसमें स्पष्ट रूप से वर्णित है कि 'वाजसनेयक' (अर्थात यजुर्वेदीय याज्ञवल्क्य शाखा के अनुयायियों) के मत के अनुसार गाय और बैल का मांस भक्ष्य (खाने योग्य) है और उसे यज्ञ में अर्पित करना सर्वथा शुद्ध माना गया है।

वशिष्ठ धर्मसूत्र (14.46): यहाँ भी भक्ष्य और अभक्ष्य पशुओं के प्रसंग में वाजसनेय ब्राह्मणों के प्रमाण को उद्धृत करते हुए दुधारू गाय और काम करने वाले बैल के मांस को शुद्ध और भक्षणीय स्वीकार किया गया है। 

निष्कर्ष (Conclusion) 

शास्त्रीय और प्रामाणिक साक्ष्यों की समीक्षा से यह पूर्णतः सिद्ध होता है कि शतपथ ब्राह्मण (3.1.2.21) और कात्यायन श्रौतसूत्र में पूर्वपक्ष ने लोक-कल्याण और कृषि-उपयोगिता को देखते हुए गोरे निषेध करने का यत्न किया था। परन्तु, महर्षि याज्ञवल्क्य ने इस पूर्वपक्ष का दृढ़ता से खण्डन किया। उनके व्यावहारिक और शास्त्रीय मत के अनुसार, यदि गाय या बैल का मांस अंसल (पुष्ट, चर्बीदार और कोमल) हो, तो वह सर्वथा भक्षणीय है। अतः नविन व्याख्याकारो द्वारा दूध-मलाई का अर्थ निकालना केवल एक वैचारिक टूलकिट है, जिसका मूल ग्रन्थों के सम्मुख कोई अस्तित्व नहीं है। 

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