आजकल आपने बहुत से लोगों से सुना होगा कि हमारे वेदों में महिलाओं की बुद्धि को बहुत श्रेष्ठ और उत्तम माना गया है, ऐसा दावा करने वाले लोग वेदों से कुछ प्रमाण भी सामने रखते हैं, आज हम उन्हीं प्रमाणों की समीक्षा करेंगे
पहला प्रमाण: ऋग्वेद (8/33/17) :
सबसे पहला प्रमाण ऋग्वेद (8/33/17) से देते हैं। उनका बोलना है कि यहाँ 'रघु' शब्द आया है और 'रघु' का अर्थ तेज होता है, न कि हल्का या छोटा पर ज़ब हम मूल मंत्र को देखते हे तो मंत्र कुछ इस प्रकार हे -
इन्द्रश्वचिद्घा तदब्रवीत्स्त्रिया अशास्यं मन: उतो अह क्रतुं रघुम्
इस मंत्र पर गंगा सहाय शर्मा जी ने प्राचीन आचार्य सायण के भाष्य (व्याख्या) के आधार पर हिंदी अनुवाद किया है और स्त्री की बुद्धि को छोटा माना है
अब इस मंत्र पर कुछ नए बालक यह तर्क देकर खंडन करने की कोशिश करते हैं कि मंत्र में 'रघु' शब्द है जिसका अर्थ 'तेज' होता है, इसलिए वेदों में स्त्री की बुद्धि को तेज माना गया है
लेकिन पहली बात तो यह बता दें कि इस मंत्र में वास्तविक शब्द 'रघु' नहीं बल्कि 'लघु' है, अब यह 'लघु' शब्द 'रघु' कैसे बना? आइए इसे व्याकरण से बहुत आसानी से समझते हैं -
उणादिसूत्र (1/29) के नियम (लङ्घिबंह्योर्नलोपश्च) के अनुसार- 'लङ्घ्' (जिसका अर्थ होता है चलना) धातु में 'न्' अक्षर को छुपाकर (लोप करके) जब 'कु' प्रत्यय लगाया जाता है, तब 'लघु' शब्द बनता है इस प्रकार 'लघु' का सीधा अर्थ होता है - हल्का या छोटा
अब महाभाष्य (8/2/18) में एक वार्त्तिक सूत्र आता है - वालमूललघ्वलमङ्गुलीनां वा लो रत्वमापद्यते
इसका सीधा नियम यह है कि कुछ शब्दों जैसे - वाल, मूल, लघु, वल, अङ्गुली आदि में 'ल' अक्षर की जगह 'र' अक्षर लगाना वैकल्पिक है। वैकल्पिक का मतलब होता है कि आप 'ल' की जगह 'र' लिख भी सकते हैं और नहीं भी
इसी नियम के कारण यहाँ 'लघु' शब्द का 'ल' बदलकर 'र' हो गया और वह 'रघु' बन गया, लेकिन पाठ (मूल अर्थ) फिर भी उसका 'लघु' ही माना जाएगा
चूंकि यह बदलाव वैकल्पिक है, इसलिए कहाँ पर यह नियम लगेगा और कहाँ नहीं, यह जानने के लिए हमें संदर्भ देखना पड़ेगा संस्कृत भाषा और वेदों के जो पुराने महान विद्वान हो चुके हैं, उनकी राय इस पर सबसे ज्यादा महत्व रखती है, प्राचीन आचार्य सायण ने अपने भाष्य में साफ-साफ लिखा है: "रघुं लघुं आह" यानी मंत्र में जो रघु है, वह असल में 'लघु' ही है। इससे हमें साफ पता चलता है कि यहाँ अर्थ 'लघु' (हल्का/छोटा) ही है
इसके अलावा, 10वीं सदी के महान आचार्य वेंकट माधव ने भी इस मंत्र के भाष्य में लिखा है - "लघु स्त्रिया प्रज्ञत्वं" इसका साफ और सीधा अर्थ है कि स्त्री की प्रज्ञा (बुद्धि) हल्की होती है इन्होने भी स्त्री की बुद्धि को छोटा ही माना है
लघु का एक अर्थ यहां संदर्भ अनुसार अस्थिर ही माना जायेगा और तर्क के अनुसार मंत्र में यही अर्थ सबसे सही बैठता है क्यों ? क्योंकि मंत्र में आगे यह भी लिखा है कि स्त्रियों के मन पर नियंत्रण लाना या शासन करना कठिन है अगर उनकी बुद्धि सिर्फ छोटी होती, तो यह कहना बिना तर्क का होता। इसलिए 'अस्थिर' अर्थ यहाँ सबसे सही बैठता है। चूंकि स्त्रियों की बुद्धि अस्थिर (चंचल) होती है, इसी कारण उनके मन पर शासन करना (यानी उनके स्वभाव को समझना और संभालना) मुश्किल होता है यही बात हमें महाभारत आदि ग्रंथो मे भी मिलती हे
अब कुछ लोग यह बोल सकते हैं कि वेदों का अर्थ सिर्फ धातुओं से निकाला जाता है, तो यहां रूढ़ शब्द नहीं होगा इसलिए वेदों में रघु का अर्थ 'छोटा' नहीं ग्रहण किआ जायेगा, लेकिन हम बता दें कि स्वयं स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वेदों में (जैसे ऋग्वेद 5/30/14 में) बहुत सी जगहों पर 'रघु' का अर्थ हल्का और छोटा ही किया है। इसके साथ ही, आर्य समाजी विद्वान तुलसी राम ने भी इस मंत्र पर स्त्री की बुद्धि को 'हीन' (कम) ही माना है
शास्त्रों में लघु या रघु का अर्थ छोटा और हीन ही माना जाता है, इसके लिए आप महाभारत (शांतिपर्व 153/1) देख सकते हैं। इसलिए स्त्री की बुद्धि को छोटा या हीन मानना पूरी तरह से शास्त्र सम्मत है, जिसे हम आगे और सिद्ध भी करेंगे
दूसरा प्रमाण : अथर्ववेद (14/2/31) और इन्द्राणी बुद्धि
कुछ लोग आपको वेदों से यह दिखाकर बहकाने की कोशिश करेंगे कि देखो, वेदों में तो महिला की तुलना 'इन्द्राणी' की बुद्धि से की गई है और उन्हें सुबुद्धा की संज्ञा दी गयी है (अथर्ववेद 14/2/31)
पर जब हम इसकी भी समीक्षा करते हे तो पाते हे की ये मंत्र विवाह के समय पढ़े जाने वाले मंत्र है जिनमे केवल आशीर्वाद, कामना और प्रार्थना मात्र हे ना की कोई सामान्य विधि
इसके विपरीत, शास्त्रों में स्वयं इन्द्राणी के पति इंद्र सभी महिलाओं की बुद्धि को 'लघु' यानी छोटा मानते हैं, यह बात हम ऊपर (ऋग्वेद 8/33/17) ही सिद्ध कर चुके हैं
यह तो बाद की बात है, लेकिन जो लोग यह बोलते हैं कि 'इन्द्राणी की बुद्धि' सबसे श्रेष्ठ है, क्या वो सच में श्रेष्ठ है ?
शास्त्रों को देखने पर पता चलता है कि नहीं। क्योंकि शास्त्रों में इन्द्राणी को एक घमंडी जो ये बोलती हे की उसके जैसा कोई हे ही नहीं तथा बाकि नारियो से द्वेष रखना और वासना (सांसारिक भोग) में डूबी हुई महिला के रूप में दिखाया गया है (देखें ऋग्वेद 10/86 और 10/159)
अब आप खुद सोचिए, जो वासना में डूबा रहे और जो घमंडी हो, क्या उसकी बुद्धि श्रेष्ठ हो सकती है? बिल्कुल नहीं। इसलिए सिद्ध होता है कि शास्त्रों में 'इन्द्राणी बुद्धि' से सिर्फ इतना ही मतलब है कि गृहस्थ जीवन में अच्छा बनो अर्थात इन्द्राणी जैसी पति को शारीरिक सुख देती रहो
गीता (16/16) में तो श्री कृष्ण जी साफ बोलते हैं कि जो व्यक्ति यह बोलता है कि 'मेरे समान दूसरा कोई नहीं है' और खुद को सबसे श्रेष्ठ बताता है, ऐसा घमंडी इंसान नरक में गिरता है। चूंकि शास्त्रों में इन्द्राणी के बारे में हर जगह यही दिखाया गया है कि वह घमंडी है और खुद को सबसे श्रेष्ठ बताती है, इसलिए यह पूरी तरह सिद्ध है कि 'इन्द्राणी बुद्धि' का मतलब कोई बहुत महान या श्रेष्ठ बुद्धि नहीं है
तीसरा प्रमाण : यजुर्वेद (22/22) और 'पुरन्धि' शब्द पे व्याख्या
कुछ लोग टूलकिट से प्रमाण लाकर बोलते हैं कि यजुर्वेद (22/22) में स्त्री को बहुत बुद्धि वाली बोला गया है क्योंकि वहाँ स्त्री के लिए 'पुरन्धि' शब्द आया है, जिससे सिद्ध होता है कि उनमें बहुत बुद्धि होती है, पर इनकी पोल आचार्य ही खोल देते हे -
इस मंत्र पर प्राचीन आचार्य उवट और महीधर साफ-साफ लिखते हैं -
"पुरं शरीरं सुर्वगुणसंपन्नं दधाति पुरन्धिः"
अर्थात जो रूप, सौंदर्य और शारीरिक गुणों से संपन्न होकर इस शरीर को धारण करती है, वही 'पुरन्धि' है। यानी यह शब्द शारीरिक सुंदरता और बनावट के लिए है, न कि बुद्धि के लिए
यहाँ तक कि इनके स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी स्वयं 'पुरन्धि' का वही अर्थ किया है जो पुराने प्राचीन आचार्यों ने किया है इसलिए यह सिद्ध होता है कि इस मंत्र में कहीं भी स्त्री को तेज या उत्तम बुद्धि वाला नहीं बोला गया है
इसके अलावा, हमारे पूरे शास्त्रों में महिलाओं की बुद्धि को पुरुषों की तुलना में व्यावहारिक रूप से कम या अस्थिर ही माना गया है इसके स्पष्ट प्रमाण आप इन जगहों पर देख सकते हैं -
1. ऋग्वेद (8/33/17)
2. महाभारत (अनुशासन पर्व 38/1)
3. मनुस्मृति (8/77)
4. मैत्रायणी संहिता (4/7/4)
5. मनुस्मृति (9/18)
6. तैत्तिरीय संहिता (6/5/8/2)
7. रामायण अरण्यकांड 45/30

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