प्राचीन काल से चला जो वेद आदि शास्त्रों में जन्मना वर्ण / जाति व्यवस्था को नहीं मानने वाले अक्सर कुछ उदाहरण देके कोशिश करते अपने मत (कर्मणा जाति व्यवस्था) को सही साबित करने का। आज हम यही कुछ उनके आक्षेपों को देखने वाले हैं कि कितना सच्चाई हैं इनके उदाहरणों पर।
- निरुक्त 2.3 में "वर्णो वर्णोते" देख कर कुछ इसका मतलब निकालते हैं - “जो चुना गया है वही वर्ण है”।
इसके साथ ही च्यवन ऋषि कभी वरदान प्राप्त था कुशिक राज को की तुम्हारा 3 पीढ़ी ब्राह्मण होगा :
और लगभग 3000 वर्षों तक तपस्या करने के बाद, (तस्य वर्ष सहस्रस्य व्रते पूर्णे महाव्रतः || वाल्मीकि रामायण 1-65-4) ऐसा 3 बार हुआ / तपस्या के कारण वह चीजों का निर्माण करने में सक्षम था इसलिए उसने अपने पूर्वजों में भी ब्राह्मणत्व को लागू किया। यहां तक कि देखें। उसकी माँ ने पवित्र पेय पीने के बाद उसे ब्राह्मण होने के लिए इतनी तीव्र तपस्या करनी पड़ी। यह कहीं भी आपके "पेशे से वर्ण उन्नयन" का समर्थन नहीं करता है!
अतः विश्वामित्र इससे ब्राह्मण सिद्ध होते हैं। कर्म का इधर वर्ण परिवर्तन पे कुछ भी सहयोग नहीं दिखता।
5. महर्षि वेद व्यास शूद्र से ब्राह्मण बन गए ?
उत्तर: नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हैं जैसा बोला जाता हैं। आइए इसको ठीक से जानते हैं। महर्षि वेद व्यास के पिता थे महर्षि पराशर और उनके माता थे सत्यवती जो मछुआरे के बेटी थी। इस बात से किए ही कुछ लोग ये बोलते कि महर्षि वेद व्यास जन्मना ब्राह्मण नहीं थे। जबकि इसको जानने हमे पूरा प्रकरण देखना होगा।
6. क्या महर्षि वाल्मीकि चंडाल/शूद्र थे ?
उत्तर: इसमें कोई संदेह नहीं कि - उनका कुछ समय कुसङ्गति में अवश्य बीता, पर वे थे ब्राह्मण ही। पाठक ध्यान दें - (1) श्रीवाल्मीकि रामायण के कर्ता श्रीवाल्मीकि मुनि माने जाते हैं। तब उस रामायण से उनका जो परिचय मिले, वह समूल कहा जाएगा। वाल्मीकि रामायण के अन्त में - श्रीवाल्मीकि को प्रचेता का पुत्र कहा गया है (7 / 111 |11) इसलिए ही श्रीवाल्मीकि की 'प्राचेतस' यह संज्ञा प्रसिद्ध है (7 / 93 |17)। प्रचेता को "मनुस्मृति - 1 | 35” में ब्रह्मा वा मनु का पुत्र कहा गया है। तब ब्रह्मा वा मनु के पुत्र प्रचेता के लड़के वाल्मीकि चाण्डाल कैसे हो सकते हैं ? अश्वमेधयज्ञ के समय जब श्रीवाल्मीकि मुनि सीता को साथ लाए, तब उन्होंने अपना परिचय दिया कि 'मैं प्रचेता का दसवाँ पुत्र हूँ, आजतक मैंने असत्य कभी कहा हो; यह मुझे स्मरण नहीं आता' (7 | 96 | 19) यही श्लोक अध्यात्म रामायण- 7/7/31 में भी मिलता है। इसमें श्रीवाल्मीकि ने अपने आप को प्रचेता का दसवाँ पुत्र कहा है। प्रचेता का परिचय दिया ही जा चुका है। इससे श्रीवाल्मीकि स्पष्टतया ब्राह्मण सिद्ध हुए।
(2) अध्यात्म रामायण - 2 | 6 | 65 में श्रीवाल्मीकि की कुसङ्गति का वृत्त दिया गया है। यहाँ पर वाल्मीकिजी ने श्रीराम को स्वयं बताया है कि मैं जन्ममात्र से ब्राह्मण हूँ, छोटी आयु में मैं किरातों (भीलों) में रहा, मेरे शूद्रों जैसे आचार रहे। फिर वाल्मीकिजी ने - 2 | 6 | 66 में बताया कि मुझ अजितेन्द्रिय के शूद्रा में बहुत से पुत्र हुए। फिर चोरों से मिलकर मैं भी चिर रहा। इससे स्पष्ट सिद्ध हुआ कि वाल्मीकि जन्म से ब्राह्मण थे। परन्तु भीलों की कुसङ्गति से शूद्रों वाला व्यवहार करने लगे थे, शूद्रा से विवाह कर लिया, कई पुत्र भी हो गए। यहाँ वाल्मीकिजी ने अपने आपको 'अजितात्मा' कहा है। यदि वह शूद्र होते, तो शूद्रा में सन्तान पैदा करने से अपने आपको 'अजितात्मा' न कहते। ब्राह्मण होने पर शूद्रों में सन्तान पैदा करने से उन्हें अपने आपको 'अजितात्मा' कहना सार्थक है। इससे स्पष्ट है कि वे जन्म से ब्राह्मण हैं। अस्तु । चोरी करते हुए उन्हें मुनि मिले। "अध्यात्म रामायण - 2 | 3 | 69 /78” - 'अपने सामने आते हुए देखकर मुझे मुनि कहने लगे - ऐ नीच ब्राह्मण ! तू क्यों आ रहा है ? यह नीच ब्राह्मण बहुत बुरे आचार वाला है' इत्यादि श्लोकों में मुनियों ने उन्हें चोरी आदि करने से अधम ब्राह्मण कहा। इससे स्पष्ट हुआ कि वाल्मीकिजी जन्म से ब्राह्मण थे, परन्तु कुसङ्गति में पड़कर शूद्रों के काम करने लग गए थे। वे जन्म से शूद्र नहीं थे – यह बात सिद्ध हो गई। "मत्स्यपुराण - 12 | 51" के इस पद्म में वाल्मीकिजी को भार्गव कहा गया है। "विष्णुपुराण - 3 | 3 | 18 में भी कहा गया है। भार्गव शब्द पर वाल्मीकि रामायण के रामाभिरामी टीकाकार ने लिखा है - प्रचेता वरुण को कहते है। इधर भृगु वरुण के पुत्र हैं, भृगु के भ्राता होने से वाल्मीकिजी को भार्गव कहते हैं (7 / 94 | 25) और प्रचेता आदि में प्रजापति थे, तब प्राचेतस-वाल्मीकि चाण्डाल कैसे हो सकते हैं ? इससे स्पष्ट होता है कि श्रीवाल्मीकिजी जन्म से चाण्डाल नहीं थे, वे जन्म से विशुद्धरूप से ब्राह्मण ही थे।
7. सत्यकाम-जाबाल वेश्या का पुत्र था; अज्ञातकुल का था, उसे गुरु ने सत्य बोलने से ब्राह्मण बना दिया। यह छान्दोग्योपनिषद् में प्रसिद्ध है।
उत्तर: यह प्रतिपक्षियों (आर्य समाज) का पक्ष अशुद्ध है। कोई ७-८ वर्ष का बालक जिसे पिता का पता न हो और वेश्यापुत्र हो; पूछने पर बताए कि मैं वेश्यापुत्र हूँ, तो क्या समाजी उसे ब्राह्मण बना देंगे ? आजकल इस प्रकार से ब्राह्मणों की संख्या बहुत बढ़ाई जा सकती है, जिससे आर्यसमाज आदि का गौरव बढ़े। तब तो जो इसके विपरीत अपने माता पिता के परिचय को ठीक-ठीक न कहे, तो क्या समाजियों के मत में वह शूद्र हो जायगा ? यदि जाबाल वेश्यापुत्र वा अज्ञातकुल का होता; तब उसे 'प्रशस्त-मातापितृक' न कहा जाता; पर 'उसे प्रशंसित माता-पिता वाला' कहा जाता है, देखिये शतपथ में "सत्यकामो जाबालोः मनो वै ब्रह्मेति..... तज्जाबालोऽञ्जवीत्”(बृहदारण्यक 4|1|6) यहाँ प्रशंसा-अर्थ में मतुप् है। सो प्रशस्त माता तथा प्रशस्त पिता, तथा प्रशस्त आचार्य वाला कहा गया है। यदि वह अज्ञातकुल वा वेश्यापुत्र होता; तब उसे प्रशंसार्थक माता-पिता वाला न कहा जाता। वस्तुतः यदि जाबाल जन्म से ब्राह्मण न होता, किन्तु वेश्यापुत्र होता, सत्यभाषण से ही उसे ब्राह्मण बनाया जाता, तो वहाँ (छान्दोग्योपनिषद् -4|4|5) यह वाक्य गुरु न कहता, प्रत्युत यह कहता कि - तूने सत्य कहा है अतः हम तुम्हें शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं। पर गुरु ने ऐसा न कह कर यह कहा कि - ब्राह्मण के बिना कोई अन्य ऐसा नहीं कहता। अर्थात् गौतममुनि सत्यकाम के सत्यभाषण से उसमें ब्राह्मणत्व आरोपित नहीं करते, किन्तु उसे पूर्वकाल से ही ब्राह्मण मानते हैं, नहीं तो उनकी ऐसी वाक्य योजना न होती। यह भी यहाँ जानना चाहिए कि - इस प्रकार सत्य बोलने पर वह ब्राह्मण बनाया भी नहीं जा सकता; नहीं तो सत्यहरिश्चन्द्र राजा को तथा महाभारतीय तुलाधार वैश्य को भी ब्राह्मण कहा जाता; क्योंकि यह भी सत्यवादी थे। समाजी के प्रति यह प्रश्न है कि उसकी माता जबाला बाह्मणी थी या शूद्रा ? यदि ब्राह्मणी, तब उसका पुत्र होने से जाबाल भी जन्म से ब्राह्मण सिद्ध हुआ। यदि वह शूद्रा थी, तो इससे समाजियों का ही पक्ष कटता है। वह ऐसे कि उसके पुत्र ने जो सत्य बोला था, इसमें उसका महत्त्व कुछ भी नहीं था, क्योंकि ऋजुबुद्धि छोटा बालक यह नहीं जान सकता कि - 'वेश्यापुत्र' कहने से मेरी कितनी हानि है ? और जो उसने यह कहा भी था - यह उसका अपना स्वतन्त्र वा स्वज्ञानपूर्वक वचन नहीं था, किन्तु यह उसने अपनी माता के वचन का अनुवादमात्र कर दिया। इस विषय में उसकी माता ही सत्यवक्त्री मानी जाएगी क्योंकि यदि वह ऐसा न कहती, तो वह छोटा बच्चा इतना भी न कह सकता। तब इस सत्यभाषण से महत्त्व उसकी माता का है, उसके ७-८ वर्ष के पुत्र का नहीं। परन्तु यदि सत्य बोलने वाली भी उसकी माता जबाला को समाजी ब्राह्मणी नहीं बताते; किन्तु शूद्रा-वेश्या ही बताते हैं, तब तो समाजी पक्ष का स्वयं उनके द्वारा ही खण्डन हो गया कि वे सत्यभाषण से तो ब्राह्मण वर्ण की व्यवस्था मानते हैं, पर सत्यभाषण से उसकी माता जबाला को ब्राह्मणी नहीं मानते, तब उसका अज्ञानपूर्वक तोतेरटन्त बोलने वाला पुत्र ही उनके मत में ब्राह्मण कैसे बन सकता है ? यदि उसकी माता ही सत्यभाषण आदि से ब्राह्मणी हुई, तब उससे उत्पन्न माता के नाम वाला जाबाल भी जन्म से ही ब्राह्मण सिद्ध हुआ, क्योंकि उसने स्वयं तो कुछ कहा ही नहीं, केवल माता के वचन का अनुवाद ही कर दिया। इस आयु में बालक में सांसारिक ज्ञान न होने से माता के कथन से अधिक कहने की शक्ति नहीं होती। अतः सत्यकाम सम्बन्धी समाजियों का पक्ष कट गया। इस पूछने से तो वर्णव्यवस्था जन्ममूलक ही सिद्ध हो रही है। नहीं तो इस छोटी आयु में जब उसने कोई विद्या नहीं पढ़ी थी; तब अच्छे गुणकर्म न होने से गुणकर्ममूलक वर्णव्यवस्था तथा वर्ण पूछना बन ही नहीं सकता।
छान्दोग्योपनिषद् - 4|4|5 का अर्थ यही है कि - ब्राह्मण के पुत्र के बिना दूसरा ऐसा नहीं कह सकता (अष्टाध्यायी - 6 |4|171)। अतः यह ब्राह्मण का पुत्र ही है। 'परिचारिणी' का अर्थ 'वेश्या' नहीं, किन्तु 'पति के पास आये अतिथियों की सेवा में लगी हुई' यह अर्थ है। निघण्टु 3| 5 में परिचरण अर्थ में 'सपर्यति' आदि धातुएँ कही गई हैं। परिचरण का अर्थ सेवा होता है, 'वेश्याकर्म' नहीं। कोई स्त्री शब्दतः वा अर्थतः अपने आपको “मैं वेश्या हूँ” यह नहीं कहती, तब जबाला के वाक्य का तदनभीष्ट अर्थ कैसे किया जा सकता है ? सो पति के अतिथियों की सेवा में लगी हुई, वह पति से गोत्र नही जान सकी। पति के अभ्यागतों के भोजनादि-सेवा का भार स्त्री पर रहता है। कभी-कभी तो स्त्रियों के एतदर्थ अपने भोजन का अवसर भी नहीं आता। मनुस्मृति - 10 । 5 पद्य में श्रीमेधातिथि ने भी इसे स्पष्ट किया है। श्रीमेधातिथि कहते हैं आचार्य गौतम को भी जाबाल के वचन से 'यह ब्राह्मण था' यह मालूम नहीं हुआ। वह तो उसे पहले से ही ब्राह्मण जानता था। [क्योंकि उस आचार्यकुल में ब्राह्मण ही जाते थे, शूद्र नहीं], केवल उसका गोत्र नहीं जानता था। गोत्र के प्रश्न से चरण (वेदशाखा वा प्रवर-सम्बन्धी) का प्रश्न समझना चाहिये; क्योंकि गोत्र-प्रवर से उपनयन की ग्रन्थियों में भेद होता है। जिस आप्त मेधातिथि के विश्वास से "अथ शब्दानुशासनम्” इस महाभाष्य के वार्तिक को पाणिनि का सूत्र माना जाता है, उस आप्त मेधातिथि के वचन से जाबाल को ब्राह्मण क्यों न माना जाए ? तब समाजियों को यदि ऐसे गोत्रानभिज्ञ लड़कों के मिलने का अवसर मिले, तो क्या वे उसे वेश्यापुत्र मानेंगे ? उपनिषद् में गोत्र पूछा गया है, वर्ण नहीं। वर्ण वा गोत्र एक नहीं होते। अतः वैखानसधर्मप्रश्न में कहा है -ब्रह्मर्षिवंशवालों को आर्षेय गोत्र की स्मृति होती है, दूसरों को नहीं; तभी तो 'कि गोत्रो तु सोम्य !' इस प्रकार ब्राह्मण सत्यकाम को जानने के लिए गौतम की इच्छा को छान्दोग्य में सूचित किया गया है। इससे हमारा पक्ष ही सिद्ध हो रहा है। इस प्रकार वैखानसधर्मप्रश्नकार ने भी जाबाल को ब्राह्मण ही बताया है। उक्त छान्दोग्यश्रुति - 4|4|2 की आनन्दगिरि ने इस प्रकार व्याख्या की है - मैं जबाला पति के घर में उनकी इच्छानुकूल अतिथि-अभ्यागतों की सेवा को बहुत करती रही; इससे परिचरण (सेवा) में लगे हुए चित्त वाली होने से पति से गोत्रादि नहीं पूछ सकी। [यौवने त्वामलभे] इस उपनिषद् के वचन से सिद्ध होता है कि जबाला का विवाह छोटी आयु में हुआ था; परन्तु गर्भ तथा प्रसव यौवन में हुआ था। इसलिए आगे वह कहती है -जवानी में पहले शर्म से पति से न पूछा गया, फिर पति मर गया, तो बहुत शोकाकुल रही, इधर-उधर से भी गोत्र को न जान सकी। इससे यह भी सिद्ध होता है कि पहले गोत्रादि-निर्णय के बिना किसी का उपवीत नहीं होता था। गोत्र का प्रश्न द्विजत्व की स्थिरतार्थ है, शूद्रों का गोत्र नहीं होता। गोत्र का न कहने वाला शुद्र माना जाता था और उसे यज्ञोपवीत नहीं दिया जाता था। यहाँ तो गोत्र न जानने पर भी ब्राह्मणता मात्र के अनुमान से यज्ञोपवीत दिया गया। शूद्र होने पर उसे 'अब्राह्मण' भी नहीं कहा जा सकता था। श्रुति में गोत्र पूछा गया है, कुल नहीं। कुल-गोत्र भिन्न-भिन्न होते हैं, जैसे कि मनुस्मृति 3|109।यदि उसकी माता शूद्रा होती, तो अपने पुत्र को उपनयन वा वेदाध्ययनार्थ आचार्यकुल में न भेजती किन्तु द्विजों की सेवा के लिए भेजती; क्योंकि शूद्र वा संकर को उपनयन का अधिकार कोई भी संस्कारविधि नहीं देती। अतः स्पष्ट है कि। जाबाल जन्म से ही ब्राह्मण था, यही बात ब्रह्मसूत्र - 1/3|37 में बताई गई है।
8. क्या महर्षि वात्स्य शूद्र पुत्र थे ?
उत्तर: पंचविंस/तांडव्य ब्राह्मण ब्राह्मण के (15:6) दिखाकर कुछ लोग ये साबित करते का कोशिश करते की महर्षि वात्स्य शूद्र माता से उत्पन्न होकर कमसे ब्राह्मण बने हालांकि ये बात बिल्कुल झूठ हैं आइए इसका सच्चाई देखते:
तांडव्य ब्राह्मण के भाष्य करते हुए आचार्य सायन ने स्पष्ट किए हैं कि; दोनों ही कण्व ऋषि के पुत्र का गोत्र एक ही था। मुनि मेधातिथि ने बस ये आक्षेप लगाया कि तुम ब्राह्मण रहित, शूद्र के पुत्र हो। (ये गुस्से में कहा गया बात हैं) मूल श्लोक और भाष्य पर हम देख सकते हैं "आक्रोशत्" आया हैं जिसका अर्थ होता हैं, अपमान करना, तिरस्कार करना। अंग्रेजी भाष्यकार ने भी निंदा और अपमान से ही अर्थ लिए हैं।
मनुस्मृति 8:116 का भाष्य करते हुए आचार्य मेधातिथि बोलते हैं, ये गुस्से में बोला गया धमकी हैं। जबकि वात्स ऋषि खुदको ब्राह्मण सिद्ध करने हेतु खुद ही सामने आए और अग्निपरीक्षा दिए। जिधर उनके एक बाल तक नहीं जला। और आचार्य मेधातिथि भी कुछ आपत्ति और उसका समाधान भी दिए जो आप लोग पढ़ सकते हो मैने ये नीचे दे देता हु हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद दोनों ही।
9. ऋषि कवष ईलूष शूद्र पुत्र थे ?
उत्तर: Aitteraya ब्राह्मण 2/8/1 इसके ऊपर आचार्य सायन भाष्य पे लिखा हैं "दास्याः पुत्र इत्युक्तिरधिक्षेपार्था" अर्थात, "दासी का पुत्र कहना तिरस्कार के लिए है।" यह वाक्य यह दर्शाता है कि "दासी का पुत्र" कहने का प्रयोग किसी को अपमानित करने या नीचा दिखाने के उद्देश्य से किया जाता है।
अब इस चीज को पूरा प्रकरण सहित समझते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण' में कथा आती है कि भृगु, अंगिरा आदि ऋषियों ने सरस्वती नदी के तट पर यज्ञ आरम्भ किया। इस यज्ञ में भाग लेने के लिए ऐलूष के पुत्र कवष भी पहुँचे, परन्तु ऋषियों ने उनको जुआरी समझकर उनसे कहा === "(दास्या: पुत्र:) कितव: अब्राह्मण: कथं नो मध्ये अदीक्षिष्ट इति) ---- अर्थात् 'दासीपुत्र, जुआरी, अब्राह्मण, अदीक्षिष्ट-- हम लोगों के बीच कैसे दीक्षित हो सकता है ?' ऐसा कहकर उन्होंने यज्ञशाला से बाहर सरस्वती नदी से अत्यंत दूर निर्जन स्थान पर ले जाकर उसे छोड़ दिया, जिससे वह सरस्वती नदी का जल न पी सके और प्यासा ही मर जाये। वे प्यास से अत्यंत व्याकुल थे और पूर्व जन्म की तपस्या तथा पुण्यकर्म के प्रभाव से ऋग्वेद दशम् मण्डल के तीसवें सूक्त 【वरुण-सूक्त】 का उन्हें ज्ञान था। उनके वरुण-सूक्त के जप के प्रभाव से वरुण देवता ने उन पर कृपा की। वरुण जी की कृपा से सरस्वती नदी का जल प्रवाह उनकी ओर बहने लगा, उन्होंने यथेष्ट जल पीकर अपनी प्यास शांत की। तब देवताओं ने प्रसन्न होकर ऋषियों को कवष की शुद्धि का परिचय दिया। ऋषियों ने अपने उपास्य देवता के द्वारा कवष की प्रशंसा सुनकर पश्चाताप किया। ऋषि आपस में कहने लगे कि जिसकी उपास्य देव भी स्तुति करते हैं, वह अनादर तथा निकाले जाने के योग्य नहीं है। अतः ऋषियों ने उन्हें बुलाकर यज्ञ में दीक्षित किया।【ऐतरेय ब्राह्मण-- 2,2,19】
यह तो हुआ उनका जीवन-चरित्र। शंका== आजकल के सुधारवादी तथा वर्णाश्रम को न मानने वाले मन्त्र में आये हुये 'दास्या: पुत्र:' , 'कितव:' तथा 'अब्राह्मण' शब्द को देखकर इनको शूद्र कहते हैं।
समाधान== वेदभाष्यकार श्री सायणाचार्य जी इन तीनों शब्दों को निंदार्थक मानते हैं। ऐलूष कवष जन्म से ब्राह्मण होने पर भी "जुआ खेलना वर्जित है" , इस बात को नहीं जानते थे। वेदज्ञान से रहित होने से ऋषियों ने 'दास्या: पुत्र:, अब्राह्मण' शब्द से अति कटु वचन कहे (गालियां दी)। ऋषियों ने 'दास्या: पुत्र:' आदि उसके जुआरीपन को दूर करने के लिए उसे दण्ड देने तथा सुधार के लिए कटूक्तियां कही। जैसे माता-पिता अपने उस पुत्र को, जो अधिक खेलता हो, पढ़ाई नहीं करता ; उसकी निंदा करते हुये माता-पिता अपने पुत्र को सुअर, गधा, बंदर कहकर डांटते है।
तो जैसा वह बालक माता-पिता द्वारा ऐसा कहने पर ही गधा, सुअर नहीं हो जाता ; वैसे ही ऋषियों द्वारा उसे दासीपुत्र तथा अब्राह्मण कहने से वह शूद्र नहीं होता। 'दास्या: पुत्र:' में अलुक् समास वाला शूद्र का पुत्र अर्थ नहीं है, किन्तु कवष जुआरी की निंदार्थक है। इसीलिए इसपर भाष्यकार सायणाचार्य जी भाष्य में लिखते हैं---- 'दास्या: पुत्र: इत्युक्ति---- रधिक्षेपार्थ:।' दासीपुत्र वचन अक्षेपार्थ है, शूद्रापुत्र कहने में इसका तात्पर्य नहीं है। व्याकरण शास्त्र में 'षष्ट आक्रोशे' 【6,3,21】 अर्थात् षष्टी विभक्ति आक्रोश अर्थ में आई है। वे ब्राह्मण होने पर भी जुआ खेलते थे, इससे आक्रोशित होकर उन्हें दासीपुत्र कहा गया है। दासीपुत्र केवल व्याकरण से ही सिद्ध नहीं होता, बल्कि साहित्य में भी गाली के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। महाकवि कालिदास प्रणीत "अभिज्ञानशाकुन्तलं" नाटक के द्वितीय अंक में सेनापति के लिए कहा है कि----- 'गच्छ ! भो दास्य: पुत्र:। ध्वंसितस्ते उत्साह वृत्तान्त।' इसी नाटक के तीसरे अंक में भी----'किमत्र उज्जैन्याम् कोऽपि चोरो नाऽस्ति, य एतद् दास्या: पुत्रं (स्वर्णभाण्डम्) नापहरति' इस वाक्य में स्वर्ण के पात्र की दासीपुत्र कहकर निंदा की गई है। यही शब्द शूद्रक प्रणीत "मृच्छकटिक" नाटक आदि अनेक ग्रन्थों में आया है।
जैसे शास्त्रों में अन्य पशु-पक्षियों की अपेक्षा गाय तथा घोड़ों की प्रशंसा करते हुए कहा गया है---
'अपशवोवा अन्ये गवाश्वेभ्य:।' 'गौ तथा घोड़ों के अतिरिक्त अन्य सब अपशु है।'
तो जैसे गौ तथा घोड़ों को छोड़कर यहां अन्य सब अपशु नहीं हो जाते, किन्तु इस वचन का तात्पर्य गौ तथा घोड़ों की प्रशंसा में है। वैसे ही 'अब्राह्मण' निंदार्थक है।
संस्कृत में निषेधात्मक छः अर्थों में कहा गया है---
"तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता। अप्राशस्त्यं विरोधश्च नञर्थाः षट् प्रकीर्तिताः।।"
अर्थात् समानता, अभाव, सद्चित्र, अल्पनिंदा तथा विरोध, इन छः अर्थों में 'नञ्' कहा जाता है। ~~~
1. तद्सदृश== अब्राह्मण अर्थात् ब्राह्मणेतर स्वभाव वाले, ब्राह्मण की निंदा वाले अर्थ में अब्राह्मण।
2. अभाव:== अपापम्।
3. तद्भिन्न== घोड़े से अतिरिक्त अनश्व ।
4. अल्प== यथा अनुदराकन्या--- बहुत पतली कन्या को अनुदरा कहा गया है।
5. अप्राशस्त्य= अपशवोवा--- अन्ये गो अश्वेभ्य:। गौ तथा घोड़े के अतिरिक्त अन्य पशु प्रशंसनीय नहीं है।
6. विरुद्ध== अधर्म अथवा अप्रशंसनीय ।
तो प्रशंसा रहित धर्म वाला 'कवष' जुआरी होने के कारण उन्हें अब्राह्मण कहा। जो ब्राह्मण जन्म पाकर भी खड़े होकर पेशाब करता है, 'नञ्' 【2/2/6】 इस सूत्र के भाष्य में गुणहीन ब्राह्मण का उदहारण देते हुये पतञ्जलि जी ने लिखा है-----
"अब्राह्मणोऽयं यस्तिष्ठन् मूत्रयति अब्राह्मणोऽयं यस्तिष्ठन् भक्षयति"
इसकी व्याख्या करते हुए श्री कैयट लिखते हैं----- "तप: श्रुतयोरभावाद् निंदया अत्र अब्राह्मण: शब्द प्रयोग:। तत्र जाति भावे अवयवे समुदाय-- रूपारोपाद् ब्राह्मण शब्द प्रयोग:।'
अर्थात् वहां ब्राह्मण शब्द तपस्या तथा श्रोत्र के अभाव वाले ब्राह्मण में प्रयुक्त हुआ है, वहां पर जाति मात्र अंग में समुदाय के आरोप से ब्राह्मण शब्द प्रयुक्त हुआ है।'
अब्राह्मण के 'नञ्' शब्द के प्रयोग से ब्राह्मण की तपस्या तथा शास्त्रज्ञान की निवृत्ति प्रकट होती है। कुछ लोग कल्पना करते हैं कि जब याज्ञिक ब्राह्मणों ने कवष को अपमानित करके सरस्वती नदी के उस पार निर्जल एवं निर्जन स्थान पर छोड़ दिया, तब उसने तपस्या करके ऋग्वेद का पूर्णज्ञान प्राप्त किया। परन्तु उनका यह वचन भी युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि उस स्थान पर कोई भी गुरुकुल नहीं था। और फिर चार-पांच मिनट के अंदर कोई भी व्यक्ति वेद नहीं पढ़ सकता। उनपर सरस्वती देवी की कृपा हुई तथा उनको चालीस अध्याय वाला "अपोनप्ष्त्रीय सूक्त" का प्रत्यक्ष हुआ। इस सूक्त के मन्त्रद्रष्टा कवष ऋषि जन्म से ही ब्राह्मण सिद्ध होते हैं, शूद्र नहीं।
देवी-देवताओं की कृपा से जुआ खेलना भी छूट गया। ऋग्वेद 【10/34/13】 में ब्राह्मण के लिए "अक्षौर्मादिव्य:" अर्थात् 'ब्राह्मण के लिए पाशा नहीं खेलना चाहिए' आया है। शास्त्रज्ञान से रहित कुछलोग इनकी माता का नाम इलुष दासी बताते हुये इन्हें दासीपुत्र कहते हैं। उनका यह कथन असत्य है, क्योंकि स्त्री का नाम अकारान्त न होकर आकारान्त होता है। जैसे-- रमा, कृष्णा, सत्या आदि। वास्तव में इनके पिता का नाम ऐलूष था, उनके पुत्र होने के कारण इन्हें ऐलूष-कवष कहते हैं।
10. इंद्र देव ने अपना वर्ण बदला था ?
उत्तर: ये आक्षेप (महाभारत,शांति-पर्व, अध्याय 22, श्लोक 11) से आता हैं। विपक्षी बोलते हैं, इंद्र ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे, लेकिन अपने कर्मों के फलस्वरूप वे क्षत्रिय बन गए। आइए देखते हैं इस अध्याय का वास्तविक संदर्भ क्या है।
तो बात यह है कि जब कुरुक्षेत्र युद्ध समाप्त हुआ, तो युधिष्ठिर के मन में संन्यास का भाव जागा और वे संन्यासी बनना चाहते थे, लेकिन अर्जुन ने उन्हें समझाया कि युद्ध लड़ना ही क्षत्रिय का परम कार्य है। त्याग और तपस्या ब्राह्मणों का कार्य है। क्षत्रिय को अपने जातिगत कर्मों का पालन करना चाहिए (श्लोक 3-4)
इसके बाद अर्जुन कहते हैं कि यदि कोई ब्राह्मण भी क्षत्रिय धर्म के अनुसार जीवन व्यतीत करे तो वह भी अच्छा है, क्यों? क्योंकि ब्राह्मण क्षत्रिय का पिता है, इसलिए क्षत्रिय भी ब्राह्मण से ही उत्पन्न होता है (श्लोक 6,7,12)। अब कर्मणा वर्ण व्यवस्था में विश्वास रखने वाले इस बात पर क्या कहेंगे? वैसे यह बात स्मृति में भी सिद्ध है,
मनुस्मृति 2:135 में कहा गया है: ब्राह्मण (दस वर्ष) और क्षत्रिय (सौ वर्ष) को पिता और पुत्र के रूप में जाना जाना चाहिए; और इन दोनों में से ब्राह्मण पिता है।
अर्जुन ने यह भी कहा था कि क्षत्रिय के लिए दूसरों द्वारा दिए गए धन पर जीवन यापन करने का कोई प्रावधान नहीं है। और यहाँ मुख्य बिंदु यह है कि इंद्र ब्राह्मण के रूप में जन्मे थे और अपने कर्मों के कारण क्षत्रिय बन गए। पहले श्लोक 6 में कहा गया है कि ब्राह्मण भी क्षत्रिय कर्म करके जीवन यापन कर सकते हैं, यह ब्राह्मणों के लिए भी अच्छा है क्योंकि ब्राह्मण क्षत्रियों के पिता हैं। यदि ब्राह्मण क्षत्रिय की तरह जीवन यापन करते हैं तो वे भी ब्राह्मण बन जाते हैं। इतिहास में हमने इसके कई उदाहरण देखे हैं, जैसे द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, परशुराम और अन्य।
इंद्र ने अपने पापी भाइयों (असुरों) का वध करके क्षत्रिय उपाधि प्राप्त की और इस प्रकार देवताओं के राजा देवेंद्र बने। अतः हमें यह देखना चाहिए कि देवेंद्र/देवता किसके गुणों से मिलते-जुलते हैं। इसके लिए हम मनुस्मृति का अध्ययन करेंगे।
मनुस्मृति 12:48 में कहा गया है कि ब्राह्मण और देवता सत्वगुण से उत्पन्न होते हैं और जन्म की पहली अवस्था हैं। अतः सभी को इस पर ध्यान देना चाहिए। महाभारत के जिस श्लोक में इंद्र को उनके कर्मों के कारण क्षत्रिय कहा गया है, उसके नीचे यह भी लिखा है कि इंद्र ने देवेंद्र का पद प्राप्त किया। हम सब जानते हैं कि इंद्र एक देवता हैं और उनमें जो गुण प्रमुख हैं, वे ब्राह्मणों में भी प्रमुख हैं। सरल शब्दों में कहें तो, जन्म से ही ब्राह्मणों और देवताओं दोनों में सत्वगुण प्रमुख होता है। क्षत्रियों में रजोगुण प्रमुख होता है, सत्वगुण नहीं। अतः मूर्ख ही यह कहेगा कि यहाँ कर्मों के आधार पर वर्ण व्यवस्था है, क्योंकि हमने यह भी देखा है कि आवश्यकता पड़ने पर एक ब्राह्मण भी क्षत्रिय का कार्य कर सकता है। इसके उदाहरण मौजूद हैं। अतः व्यक्ति निश्चित रूप से क्षत्रिय के समान होते हुए भी ब्राह्मण बना रहता है।
11. क्या महर्षि कक्षीवान शूद्र थे?
उत्तर: आचार्य सायन लिखते हैं उशीग्ना नाम की स्त्री दासी को ऋषि के पास भेजा गया और ऋषि ने उनको मंत्र से ऋषि पुत्री बना दिया अर्थात ब्रह्माणी।
जैसे कक्षीवान ऋषि उत्पन्न हुए।।
पिता महर्षि + माता ब्रह्माणी -> ब्राह्मण पुत्र (ऋग्वेद 1:125:1 सायन भाष्य)
12. राजा वीतहव्य क्षत्रिय से ब्राह्मण बन गए ?उत्तर: एक आक्षेप जो राजा वीतहव्य क्षत्रिय से ब्राह्मण होगया तो कर्मणा वर्ण व्यवस्था सिद्ध हुआ। ऐसा नहीं, क्योंकि (अनुशासन पर्व 30/44-66) देखने को मिलता राजा वीतहव्य ने दिवोदासकुमार प्रतर्दन अपने प्राण बचाने के लिए ऋषि भृगु के आश्रम पे आश्रय लिए और ऋषि भृगु ने उनको अभय दान दिए। जब दिवोदासकुमार प्रतर्दन आके ऋषि भृगु से पूछा कि राजा वीतहव्य के बारे में तब ऋषि भृगु ने बोला, ईधर सब ब्राह्मण हैं इतने बोलने से ही राजा वीतहव्य को ब्राह्मणत्व प्राप्त हुआ। जैसा कि ( योग सूत्र 2/36) पे आया हैं "सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्" की योगियों में सत्य का प्रतिष्ठा होने से वो जो बोलता सब सत्य होता, महर्षि भृगु के बचन से राजा वीतहव्य ब्राह्मण होगया।
और इसमें भी उत्तम,मध्यम और निम्न होता हैं, और इन गुणों के आधार पर कौनसा कौनसा वर्ण में जन्म मिलता है मनुस्मृति 12.41-48 तक देख सकते हैं।

























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