प्रश्न- मनुस्मृति में आए 'दास' शब्द का क्या अर्थ है? क्या इसका अर्थ केवल नौकर है जैसे आज सरकारी दफ्तरों में होता है जो अपनी मर्जी का मालिक है कभी भी नौकरी छोर सकता है अथवा वो slave अर्थ में प्रयुक्त होता है जो अपने मालिक के आदेश के अधीन है?
मनुस्मृति में आया 'दास' शब्द आज के सरकारी या निजी दफ्तरों के स्वेच्छिक कर्मचारी (नौकर) के लिए प्रयुक्त नहीं हुआ है, बल्कि यह मुख्य रूप से 'Slave' (गुलाम / परतन्त्र व्यक्ति) के अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है
धर्मशास्त्रों तथा मेधातिथि और कुल्लूकभट्ट के भाष्यों के अनुसार इसका पूर्ण विश्लेषण इस प्रकार है:
१. 'दास' और 'भृतक/कर्मकर' में मौलिक अंतर
प्राचीन धर्मशास्त्रों और उनके भाष्यों में सेवा करने वाले व्यक्तियों को दो स्पष्ट श्रेणियों में विभाजित किया गया है
भृतक / कर्मकर (Salaried Employee): जो व्यक्ति निश्चित वेतन (भृति) या मजदूरी पर काम करता था
। इनके पास व्यक्तिगत स्वतंत्रता (स्वातंत्र्य) होती थी और वे अनुबंध/समय समाप्त होने पर अपनी इच्छा से काम छोड़ सकते थे । दास (Slave/Bonded Person): जो व्यक्ति पूरी तरह से अपने स्वामी के स्वामित्वाधीन और परतन्त्र होता था
। दास अपनी मर्जी से सेवा छोड़कर नहीं जा सकता था ।
२. मनुस्मृति में दासों के सात प्रकार (अध्याय ८, श्लोक ४१५)
मनुस्मृति में दासों की सात योनियाँ (उत्पत्ति के स्रोत) बताई गई हैं
ध्वजाहतो मुक्तदासो गृहजः क्रीतदत्त्रिमौ। पैत्रिको दण्डदासश्च सप्तैते दासयोनयः॥ (मनुस्मृति ८.४१५)
ध्वजाहृत: युद्ध में बंदी बनाया गया शत्रु
। भक्तदास: अकाल या भुखमरी में जीवन रक्षा के लिए स्वयं दासत्व स्वीकार करने वाला
। गृहज: घर की दासी के गर्भ से उत्पन्न संतान
। क्रीत: मूल्य देकर खरीदा गया व्यक्ति
। दत्त्रिम: किसी के द्वारा उपहार या दान में दिया गया दास
। पैत्रिक: पूर्वजों (पिता-दादा) से उत्तराधिकार में प्राप्त दास
। दण्डदास: अदालती जुर्माना या राजदण्ड न चुका पाने के कारण दास बनाया गया व्यक्ति
।
३. मेधातिथि और कुल्लूकभट्ट के भाष्य का दृष्टिकोण
मेधातिथि भाष्य:
परतन्त्रता एवं स्वामित्वाधिकार: मेधातिथि मनुस्मृति की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि दासत्व का मूल लक्षण 'परतन्त्रता' (अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का पूर्ण अभाव) है
। मेधातिथि के अनुसार, भृतक (वेतनभोगी कर्मचारी) और दास में यही अंतर है कि भृतक अपने कर्म का मूल्य (वेतन) लेता है और स्वतंत्र रहता है, जबकि दास स्वामी के स्वामित्वाधिकार (स्वाम्य) में रहता है । संपत्ति का अधिकार न होना: मनुस्मृति ८.४१६ (भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः) पर व्याख्या करते हुए मेधातिथि समझाते हैं कि दास का अपना कोई स्वतंत्र आर्थिक या कानूनी स्वत्व नहीं होता; दास द्वारा अर्जित धन या उसकी वस्तु पर उसके स्वामी का ही अधिकार माना जाता है
।
कुल्लूकभट्ट भाष्य:
स्वामी के आदेश के अधीन होना: कुल्लूकभट्ट श्लोक ८.४१५ का भाष्य करते हुए लिखते हैं कि ये सातों प्रकार के व्यक्ति 'दास्य' की श्रेणी में आते हैं। कुल्लूकभट्ट के अनुसार, इनका शरीर और श्रम स्वामी के अधीन होता है। इन्हें बिना स्वामी की अनुमति के कहीं जाने या त्यागपत्र देने जैसी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती।
४. कानूनी स्थिति: क्या दास अपनी मर्जी का मालिक था?
इस्तीफा/त्यागपत्र का अधिकार नहीं: modern सिविल सर्वेंट्स या कर्मचारियों की तरह दास जब चाहे नौकरी नहीं छोड़ सकता था
। नारद और कात्यायन स्मृतियों तथा भाष्यों में उल्लेख है कि दास को केवल स्वामी की विशेष प्रसन्नता, स्वयं निष्क्रय मूल्य (मुक्ति राशि) देने, या स्वामी के प्राण बचाने जैसे दुर्लभ अवसरों पर ही स्वामी द्वारा मुक्त किया जा सकता था । क्रय-विक्रय व संपत्ति का दर्जा: मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों के अनुसार, दासों का क्रय-विक्रय, दान, और दाय (वसीयत/उत्तराधिकार) में बंटवारा संभव था
।
मनुस्मृति में 'दास' शब्द का प्रयोग 'Slave' (पूर्णतः स्वामी के अधीन रहने वाले व्यक्ति) के रूप में हुआ है, न कि आज के किसी स्वतंत्र वेतनभोगी कर्मचारी के अर्थ में
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