वेदों में इतिहास है या नहीं? — 1931 का वह शास्त्रार्थ जिसने आर्य समाज की नींव हिला दी

 

शास्त्रार्थ

"क्या वेदों में इतिहास है?"
लाहौर, 18–22 मई, 1931 ई.

१. प्रस्तावना — एक विद्वान पर आक्रमण

यह सम्पूर्ण शास्त्रार्थ आर्य समाज के कुछ दिग्गजों की चालाकी और साजिश का परिणाम था। इसका नायक था पंडित विश्वबन्धु शास्त्री एम.ए. — एक मेधावी युवक, जो संस्कृत का प्रोफेसर था और 'दयानन्द ब्राह्म महाविद्यालय' (लाहौर) के अन्तर्गत 'वैदिक आश्रम' का आचार्य (प्रिंसिपल) बनाया गया था। यह आश्रम वास्तव में एक संस्कृत विद्यालय था, जिसे उसने 'श्री दयानन्द ब्राह्म महाविद्यालय' का नाम दिया और इसे बहुत उन्नत बनाया।

विश्वबन्धु जी की गलती यह थी कि वह विद्यार्थियों को पढ़ाते थे कि वेदों में राजाओं, ऋषियों आदि का इतिहास है। वे कहते थे कि ईश्वर ने समाधि अवस्था में ऋषियों को वेद का ज्ञान दिया, किन्तु समाधि टूटने पर उन्हें सब कुछ याद नहीं रहा और उन्होंने अपनी भाषा में छन्दोबद्ध किया — यह स्पष्ट रूप से ऐतिहासिक दृष्टिकोण था।

आर्य समाज के रूढ़िवादी नेताओं (जैसे महात्मा हंसराज और पंडित भगवद्दत्त) को यह बात असह्य थी, क्योंकि उनका सिद्धान्त था कि वेद अपौरुषेय (ईश्वर-प्रणित) और नित्य (अनादि) हैं, जिनमें किसी राजा-रानी का इतिहास नहीं हो सकता। उन्होंने तय किया कि विश्वबन्धु को या तो सुधारा जाए या फिर उन्हें बदनाम करके हटाया जाए। इसके लिए उन्होंने एक शास्त्रार्थ (धार्मिक बहस) का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य विश्वबन्धु को परास्त करना था।

२. पक्ष-निर्धारण — चतुराई से पक्ष बदलना

शास्त्रार्थ का मूल विषय था — "क्या वेदों में इतिहास है?" विश्वबन्धु जी स्पष्ट रूप से 'हाँ' कहना चाहते थे, किन्तु पंडित राजाराम शास्त्री (एक बुद्धिमान और व्यवहारकुशल विद्वान) ने उन्हें सलाह दी कि वे सीधे यह न कहें, क्योंकि इससे पूरा आर्य समाज उनके विरुद्ध हो जाएगा। राजाराम ने कहा — "आप केवल इतना कहें कि 'निरुक्तकार यास्क वेदों में इतिहास मानता है, ऐसा मुझे सन्देह है'।" इस सन्देह वाले पक्ष को वे इसलिए चुने गए क्योंकि राजाराम ने आश्वासन दिया कि इस स्थिति पर वे उनका साथ देंगे, किन्तु यदि वे खुलेआम 'वेदों में इतिहास है' कहेंगे तो वे असमर्थ होंगे। इस प्रकार विश्वबन्धु को वास्तविक पक्ष छिपाकर 'सन्देह' का सहारा लेने को मजबूर किया गया।

विरोधी पक्ष (जो कहता था कि वेदों में इतिहास नहीं) में चार विद्वान थे — पंडित भगवद्दत्त (रिसर्च स्कॉलर), पंडित ब्रह्मदत्त (जिज्ञासु), पंडित बुद्धदेव (मीरपुरी), और ठाकुर अमर सिंह (आर्य प्रचारक) — जो बाद में अमर स्वामी बने।

इसके अलावा, पंडित गुरुदत्त (शास्त्री, बटाला) को भी उनकी ओर से शामिल किया गया, क्योंकि उन्होंने 'वैदिक इतिहासार्थ निर्णय' नामक ग्रन्थ के आधार पर बहस में भाग लेने का बहुत आग्रह किया।

श्रोताओं में कई प्रसिद्ध विद्वान थे — जैसे स्वामी अच्युतानन्द, स्वामी नित्यानन्द, महामहोपाध्याय आर्यमुनि, आदि। अध्यक्षता महात्मा हंसराज ने की।

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३. शास्त्रार्थ की कार्यवाही — चालाकी और कुतर्क

प्रथम बैठक (18 मई, प्रातः)

बैठक की शुरुआत में राजाराम ने घोषणा की कि उन्होंने निरुक्त के छः स्थल चुने हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि यास्क वेदों में इतिहास मानता है। उन्होंने सबसे पहला स्थल निरुक्त ६.२२"कुरुञ्जो राजा बभूव" (कुरुञ्ज नाम का राजा हुआ था) — उद्धृत किया। यह स्पष्ट ऐतिहासिक कथन है।

विरोधी पक्ष (भगवद्दत्त, ब्रह्मदत्त, बुद्धदेव) ने तुरंत कहा कि यह 'औपचारिक' (आलंकारिक) अर्थ है, वास्तविक नहीं। उन्होंने दुर्गाचार्य और स्कन्दस्वामी की टीकाओं का सहारा लेकर कहा कि 'कुरुञ्ज' का अर्थ 'बिजली' या 'मेघ' है, राजा नहीं। इस प्रकार उन्होंने प्रचलित शब्दार्थ को नकारकर मनमाना अर्थ गढ़ना शुरू किया।

विश्वबन्धु ने कहा कि वे सन्देह की स्थिति में हैं, किन्तु वे यास्क के शब्दों को देखकर इतिहास की ओर झुकते हैं। राजाराम ने इसकी पुष्टि में कहा कि "कुरुञ्जो राजा बभूव" — इसमें 'बभूव' भूतकाल है, जो स्पष्ट रूप से किसी राजा के होने की बात करता है।

द्वितीय बैठक (18 मई, सायं)

इस बैठक में महात्मा हंसराज ने दोनों पक्षों से मन्त्र का अर्थ लिखकर देने को कहा, किन्तु विश्वबन्धु ने इसे टाल दिया, यह कहकर कि पहले यौगिक प्रक्रिया और नैरुक्त सिद्धान्त पर निर्णय होना चाहिए। राजाराम ने उसी स्थल को दोहराते हुए कहा कि यास्क ने 'कुरुञ्ज' की व्युत्पत्ति "कुरून् गच्छति" (क्रूरों को नष्ट करने वाला) से की है, और फिर 'राजा बभूव' कहा है — अतः यह ऐतिहासिक है।

भगवद्दत्त ने तर्क दिया कि 'बभूव' का अर्थ 'भवति' (होता है) भी हो सकता है, क्योंकि वैदिक भाषा में भूतकाल के स्थान पर वर्तमान का प्रयोग होता है। उन्होंने 'नोधा ऋषिर्भवति' आदि उदाहरण दिए, किन्तु राजाराम ने कहा कि 'भवति' का अर्थ वहाँ 'होता है' है, परन्तु 'बभूव' विशेष रूप से भूतकाल को द्योतित करता है — इसलिए यह राजा के पूर्व में होने को बताता है।

तृतीय बैठक (19 मई, प्रातः)

यहाँ राजाराम ने एक नई बात रखी — उन्होंने कहा कि "व्युत्पत्ति निमित्त" और "प्रवृत्ति निमित्त" में भेद है। व्युत्पत्ति से अर्थ नहीं, बल्कि रूढि (प्रसिद्धि) से अर्थ होता है। उदाहरण — 'धनपति' नाम के व्यक्ति को 'धन का मालिक' नहीं, बल्कि उस नाम वाला व्यक्ति समझा जाता है। इसी प्रकार 'कुरुञ्ज' यदि राजा के रूप में प्रसिद्ध है, तो व्युत्पत्ति चाहे कुछ भी हो, वह राजा ही है। यह विशुद्ध ऐतिहासिक तर्क था।

इस पर भगवद्दत्त ने कहा कि यास्क ने 'गो' (गाय) के अनेक अर्थ किए हैं — जैसे 'पृथ्वी', 'वाणी', 'इन्द्रिय' आदि — और उन सब की व्युत्पत्ति नहीं की, अतः यास्क का मुख्य कार्य व्युत्पत्ति नहीं, बल्कि अर्थ-निर्णय है। उन्होंने कहा कि "अर्थनिरपेक्षः परीक्षेत" (अर्थ की परीक्षा करनी चाहिए) — इसलिए जहाँ अर्थ ऐतिहासिक निकलता है, वहाँ उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। यह उनका खंडन-मात्र था, समाधान नहीं।

चतुर्थ बैठक (19 मई, सायं)

यहाँ विश्वबन्धु ने कहा कि उनका पक्ष 'वेदों में इतिहास नहीं' है, किन्तु वे सन्देह प्रकट कर रहे हैं। महात्मा हंसराज ने उनसे स्पष्ट रूप से पूछा — "क्या आप वेदों में इतिहास मानते हैं या नहीं?" विश्वबन्धु ने टालमटोल करते हुए कहा कि पहले 'यौगिक प्रक्रिया' पर निर्णय हो। राजाराम ने स्पष्ट कहा — "मैं तो सन्देह वाला पक्ष लेकर आया हूँ, किन्तु यदि हमें सिद्ध करना है कि यास्क इतिहास मानता है, तो हम कर सकते हैं।"

विरोधी पक्ष ने इस मौके पर 'स्कन्दस्वामी' और 'दुर्गाचार्य' के हवाले देकर कहा कि वे 'औपचारिक' अर्थ करते हैं, अर्थात् इतिहास की बातें उपमा या स्तुति के लिए हैं, वास्तविक नहीं। किन्तु राजाराम ने जवाब दिया — "स्कन्द और दुर्ग तो बाद के आचार्य हैं, यास्क स्वयं 'कुरुञ्जो राजा बभूव' कहते हैं, जो कि किसी स्तुति या उपमा का वाक्य नहीं, बल्कि एक तथ्यात्मक घोषणा है।"

पाँचवीं बैठक (20 मई, प्रातः)

विश्वबन्धु ने अचानक अपना रुख बदलकर कहा कि उन्हें 'अपौरुषेयत्व' (ईश्वर-प्रणित) में विश्वास है, लेकिन वेदों के अर्थों में अनेकता (अनेकार्थ) हो सकती है। यह उनकी कूटनीति थी, क्योंकि वे वास्तव में इतिहास मानते थे, पर दबाव में आकर पीछे हट रहे थे। राजाराम ने इस पर कहा — "हमने तो छः स्थल दिए हैं, उनमें से पहले पर ही पूरा समय बीत गया। बाकी पर विचार होना चाहिए।"

महात्मा हंसराज ने बीच-बचाव करते हुए कहा कि 'कसौटी' (मानदण्ड) पहले तय हो — अर्थात् किस आधार पर वेदार्थ किया जाए — यौगिक (व्युत्पत्ति) या रूढ (प्रसिद्धि)। विरोधी पक्ष ने यौगिक को ही प्रमाण मानने पर जोर दिया, क्योंकि उससे वे मनमाना अर्थ कर सकते थे। राजाराम ने कहा कि यास्क स्वयं रूढि को महत्त्व देते हैं — जैसे 'धनपति' नामवाले को ही धनपति कहते हैं, व्युत्पत्ति से नहीं। यह निर्णायक तर्क था।

छठी बैठक (20 मई, सायं)

यहाँ स्वामी सर्वदानन्द और स्वामी नित्यानन्द ने हस्तक्षेप किया और कहा कि "यदि वेदों में इतिहास मान लिया, तो वेदों का नित्यत्व नहीं रहेगा" — यही उनका मूल भय था। उन्होंने राजाराम और विश्वबन्धु को समाज-विरोधी ठहराने की कोशिश की। विश्वबन्धु ने इस पर कहा — "मेरे विरुद्ध पिछले छः मास से अखबारों में अभियान चल रहा है। मुझे नास्तिक कहा गया।" उन्होंने यह भी बताया कि प्रिंसिपल देवीचन्द ने सार्वजनिक भाषणों में कहा था — "मेरा मत यह नहीं कि स्वामी दयानन्द बिगड़े नहीं, और यह भी नहीं कि उन्होंने कोई गलती नहीं की।"

इस बैठक में राजाराम ने स्पष्ट कहा — "मैं आर्य समाज में सच्चाई लेकर आया हूँ। मुझे विरासत में कट्टर ब्राह्मणपन मिला था, पर मैंने सच्चाई नहीं छोड़ी। मैं चाहता हूँ कि आर्य समाज इन कठिनाइयों को महसूस करे और उनका हल करे।"

विरोधी पक्ष ने यह 'प्रोपेगण्डा' (प्रचार) बताकर खारिज कर दिया, किन्तु राजाराम ने जोर देकर कहा — "हमें सब-कमेटी बनाकर इस पर गहन विचार करना चाहिए।"

सातवीं बैठक (21 मई, प्रातः)

राजाराम ने दूसरा स्थल"इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति" (ऋ. १०.७५.५) — प्रस्तुत किया, और निरुक्त ६.२६ का हवाला दिया, जहाँ यास्क ने विपाट नदी के नामकरण की कथा बताई है — कि वसिष्ठ ऋषि जब मरने लगे, तो उन्होंने स्वयं को पाशों में बाँधकर नदी में फेंक दिया; नदी ने पाश काटकर उन्हें बचाया, इसलिए उस नदी का नाम 'विपाट' (जो पाशों को काटे) पड़ा। यास्क ने यह स्पष्ट ऐतिहासिक वृत्तान्त दिया है। राजाराम ने कहा — "महाभारत में भी यही कथा मिलती है। यह सिद्ध करता है कि वेदों में इतिहास है।"

विरोधी पक्ष (बुद्धदेव) ने कहा कि यह 'नाड़ी-विषयक' अर्थ है — गंगा, यमुना आदि शरीर की नाड़ियाँ हैं, नदियाँ नहीं। उन्होंने योगशास्त्र का सहारा लेकर कहा कि वसिष्ठ के बन्धन नाड़ी-बन्धन हैं, जो योग से टूटते हैं। किन्तु राजाराम ने तुरंत कहा — "यास्क ने स्पष्ट शब्दों में कहा है — 'पाशा अस्यां व्यपाश्यन्त वसिष्ठस्य मुमूर्षतः' — अर्थात् वसिष्ठ के पाश टूटे। वह व्यक्ति-विशेष का इतिहास है, कोई नाड़ी नहीं।"

इसी बैठक में राजाराम ने तीसरा स्थल'पुरुच्छेद' का प्रमाण दिया — जहाँ यास्क कहते हैं — "तत्पुरुच्छेदस्य शीलम्" (निरु. १०.४२) — अर्थात् यह पुरुच्छेद (ऋषि) का स्वभाव है कि वह पदों को दोहराता है। इससे स्पष्ट है कि यास्क उस मन्त्र को ऋषिकृत (मानव-रचित) मानते हैं, ईश्वर-प्रणित नहीं। यह सबसे बड़ा प्रमाण था, क्योंकि इससे ऋषि-कर्तृत्व सिद्ध होता है, जो इतिहास का आधार है।

भगवद्दत्त ने इस पर कोई ठोस उत्तर नहीं दिया, बल्कि वेदान्तियों और मीमांसकों के मतों का जिक्र करके भ्रम पैदा करने की कोशिश की।

आठवीं बैठक (21 मई, सायं)

विश्वबन्धु ने अब 'तूर्वश' और 'यदु' जैसे मानव-नामों का उल्लेख किया, जो निघण्टु में 'मनुष्यनाम' में आते हैं। उन्होंने कहा — "यदि 'तूर्वश' का अर्थ 'मनुष्य' मान लें, तो 'यदु' भी मनुष्य हुआ — किन्तु वेद में 'तूर्वश यदु' साथ-साथ आते हैं, तो इसका क्या अर्थ होगा? स्पष्ट है, ये जातियाँ या व्यक्ति हैं — इतिहास है।"

भगवद्दत्त ने यह तर्क देने की कोशिश की कि 'यदु' का अर्थ 'मनुष्य' ही है, और 'तूर्वश' भी 'मनुष्य' — परन्तु राजाराम ने कहा — "यदि दोनों 'मनुष्य' ही हैं, तो 'तूर्वश यदु' का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता। वेद में ऐसा पुनरुक्ति नहीं होती। इसलिए ये दो भिन्न जातियाँ या व्यक्ति हैं।"

महामहोपाध्याय आर्यमुनि ने इस मौके पर कहा — "यदि हम इतिहास मानेंगे, तो 'गोवध' (गाय वध) भी वेदों से सिद्ध कर सकते हैं, जो कि आर्यसमाज के विरुद्ध है।" — यह भय-प्रदर्शन था, तर्क नहीं।

विश्वबन्धु ने फिर 'मनुस्मृति' और 'शतपथ ब्राह्मण' से यह सिद्ध किया कि वेद के शब्दों से ही सभी नाम रखे गए — अर्थात् वेद में वे नाम पहले से थे — और वे व्यक्तियों के नाम हैं, केवल प्रतीक नहीं।

नवमी (अंतिम) बैठक (22 मई, प्रातः)

अंतिम बैठक में विश्वबन्धु ने कहा — "मैं वेदों को ईश्वरीय मानता हूँ, किन्तु 'ईश्वर की सत्ता' पर सन्देह हो सकता है — यह बात असंगत है। मैं तो 'वेदों में इतिहास' को ही सत्य मानता हूँ।" इस पर महात्मा हंसराज ने पूछा — "तो क्या आप स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वेदों में इतिहास है?" विश्वबन्धु ने उत्तर दिया — "हाँ, मैं स्पष्ट रूप से कहता हूँ — मुझे 'इतिहास' का ही बोध होता है।" — यह उनका अन्तिम सत्य था, जिसे उन्होंने दबाव में आकर उगल दिया।

राजाराम ने सारांश में कहा — "हमने छः स्थल प्रस्तुत किए — 'कुरुञ्जो राजा बभूव', 'विपाट' की कथा, 'पुरुच्छेद', 'मुद्गल' का युद्ध, 'तूर्वश-यदु' के नाम, और 'प्रस्कण्व' आदि ऋषियों के नाम। प्रत्येक पर हमने सिद्ध कर दिया कि यास्क स्वयं उन्हें ऐतिहासिक मानते हैं। विरोधी पक्ष ने केवल 'औपचारिक', 'नाड़ी', 'उपमा' आदि बनाकर टालने की कोशिश की, परन्तु कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया।"

महात्मा हंसराज ने अंतिम भाषण में कहा — "इस बहस से स्पष्ट है कि विश्वबन्धु जी का निश्चित पक्ष'वेदों में इतिहास है' — है। यह उनका सिद्धान्त है, न कि कोई सन्देह। यदि हम इसे मान लें, तो हमें यूरोपीय सिद्धान्त (ऋषि-कर्तृत्व) को स्वीकार करना पड़ेगा, और वेदों का नित्यत्व छोड़ना पड़ेगा। मैं व्यक्तिगत रूप से स्वामी दयानन्द के पक्ष को ही मानता हूँ — कि वेद अपौरुषेय हैं, और ऋषि केवल द्रष्टा हैं, कर्ता नहीं।"

इस प्रकार बहस अनिर्णीत रही — कोई औपचारिक निर्णय नहीं हुआ। किन्तु तथ्य स्पष्ट था — राजाराम और विश्वबन्धु ने प्रमाणों (निरुक्त, ऋग्वेद, ब्राह्मणों, महाभारत आदि) के आधार पर सिद्ध कर दिया था कि यास्क वेदों में इतिहास मानते थे। विरोधी पक्ष केवल कुतर्क, आक्षेप और धमकी का सहारा ले सका।

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४. विरोधी पक्ष की चालाकियाँ (साजिश का पर्दाफाश)

इस पूरी बहस में आर्य समाज के नेताओं ने अनेक अनुचित तरीके अपनाए:

  1. विश्वबन्धु को पहले ही सलाह दी गई (राजाराम द्वारा) कि वे 'सन्देह' वाला पक्ष लें, अन्यथा वे बहस ही नहीं जीत पाएँगे। इससे वास्तविक पक्ष कमजोर हुआ।
  2. विरोधी पक्ष ने बार-बार व्यवधान डाला, शोर किया, और बीच में ही बात काट दी। बैठकों में अनेक बार 'कोलाहल' हुआ।
  3. उन्होंने 'कसौटी' (मानदण्ड) की बात उठाकर बहस को अनिश्चित करने का प्रयास किया — कि पहले तय करें कि व्युत्पत्ति प्रमाण है या रूढि। जब राजाराम ने रूढि को प्रमाणित किया, तो वे और भी उलझ गए।
  4. विश्वबन्धु पर दबाव डाला गया — उनके विरुद्ध अखबारों में अभियान चलाया गया, उन्हें 'नास्तिक' कहा गया, और उन्हें नौकरी से निकालने की धमकी दी गई (जैसा कि बाद में हुआ)।
  5. स्वामी सर्वदानन्द और स्वामी नित्यानन्द जैसे 'संन्यासियों' ने धार्मिक भय फैलाया — कि यदि इतिहास माना तो 'वेदों का सौन्दर्य' नष्ट हो जाएगा और 'समाज का पतन' होगा। यह भावनात्मक तर्क था, वैज्ञानिक नहीं।
  6. सबसे बड़ी चाल — उन्होंने 'यास्क' के शब्दों को 'औपचारिक' (आलंकारिक) बताकर उनके शाब्दिक अर्थ को ही नकार दिया, जबकि निरुक्त का मूल उद्देश्य ही शब्दों का अर्थ बताना है, न कि उन्हें उलटना।
  7. भगवद्दत्त ने 'स्कन्दस्वामी' और 'दुर्गाचार्य' की टीकाओं को मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया, जबकि राजाराम ने दिखाया कि स्कन्द स्वयं अनेक स्थानों पर इतिहास स्वीकार करते हैं (जैसे 'मुद्गल' प्रकरण में)।
  8. अंत में, उन्होंने 'सब-कमेटी' बनाने की बात कहकर निर्णय को टाल दिया, और व्यक्तिगत हमलों (जैसे — 'विश्वबन्धु ने बुलनर को गुरु माना') से विषय को भटकाया।
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५. क्या राजाराम जी का पक्ष सिद्ध हुआ?

निस्संदेह, हाँ।

यद्यपि औपचारिक रूप से किसी ने विजय घोषित नहीं की, परन्तु तर्कों और प्रमाणों के आधार पर राजाराम-विश्वबन्धु पक्ष पूरी तरह सिद्ध हो गया:

  • 'कुरुञ्जो राजा बभूव' — भूतकाल में राजा का होना स्पष्ट है।
  • 'विपाट' — वसिष्ठ की कथा साफ ऐतिहासिक है।
  • 'पुरुच्छेद' — ऋषि-कर्तृत्व का प्रमाण।
  • 'मुद्गल' — युद्ध-वर्णन, जिसे यास्क ने 'इतिहास' कहा है (निरु. ६.२३ — "तत्रेतिहासमाचक्षते"
  • 'तूर्वश-यदु' — मानव-नाम, जो जातियों या व्यक्तियों के रूप में मिलते हैं।
  • 'प्रस्कण्व', 'नभाक', 'हिरण्यस्तूप' आदि ऋषियों के नाम, जो स्वयं अपने सूक्तों में अपने नाम लेते हैं — यह ऋषि-कर्तृत्व और इतिहास को प्रमाणित करता है।

विरोधी पक्ष इन प्रमाणों का खंडन नहीं कर सका। उन्होंने केवल 'औपचारिक', 'नाड़ी', 'उपमा' जैसे कृत्रिम अर्थ गढ़े, जिनका निरुक्त या वेद के साथ कोई आधार नहीं था।

इसके अतिरिक्त, यास्क ने निरुक्त २.१६ में स्पष्ट कहा है — "तत्रोपमार्थेन युद्धवर्णा भवन्ति" — अर्थात् उपमा के लिए युद्ध-वर्णन किए जाते हैं — इसका तात्पर्य यह है कि कुछ स्थानों पर उपमा के लिए भी वास्तविक युद्धों का आधार लिया गया है, क्योंकि बिना किसी वास्तविक घटना के उपमा नहीं बन सकती। यह इतिहास को ही स्वीकार करना है।

महात्मा हंसराज ने स्वयं अंत में स्वीकार किया — "विश्वबन्धु जी का निश्चित पक्ष है — 'वेदों में इतिहास है' — यह पश्चिमी विद्वानों का पक्ष है" — इससे स्पष्ट है कि विश्वबन्धु की बात सही थी, और आर्य समाज का पक्ष कमजोर

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६. सनातन धर्म का सत्य — वेदों में इतिहास है

यह बात केवल राजाराम और विश्वबन्धु की नहीं, बल्कि समस्त सनातन धर्म का प्राचीन एवं निर्विवाद सिद्धान्त है:

  • निरुक्त (यास्क) स्वयं इतिहास शब्द का प्रयोग करते हैं — "तत्रेतिहासमाचक्षते" (निरु. ६.२३) — अर्थात् वहाँ वे इतिहास कहते हैं।
  • वेदों में राजाओं, ऋषियों, युद्धों, नदियों के नाम और उनकी कथाएँ भरी पड़ी हैं।
  • ब्राह्मण ग्रन्थ (जैसे शतपथ, ऐतरेय) तो खुलेआम इतिहास का वर्णन करते हैं — जैसे पुरूरवा-उर्वशी, वसिष्ठ-विश्वामित्र आदि।
  • पाणिनि ने ऋषियों के नामों को 'प्रोक्त' (कहे हुए) सूत्रों में दर्शाया है, जो ऋषि-कर्तृत्व को स्वीकार करता है।

आर्य समाज का 'अपौरुषेयत्व' का सिद्धान्त ईसाई और इस्लाम के प्रभाव में आया एक नवीन विचार है, जो वैदिक परम्परा से मेल नहीं खाता। वेद स्वयं ऋषियों को 'मन्त्रकृत्' (मन्त्र बनाने वाला) कहते हैं|

इसलिए, निर्णय यह है कि राजाराम शास्त्री और विश्वबन्धु का पक्ष ही सत्य है। विरोधी पक्ष की चालाकी और कुतर्क के बावजूद, तथ्य प्रबल थे। यही कारण है कि आज सभी गम्भीर विद्वान (चाहे वे पश्चिमी हों या भारतीय) वेदों में इतिहास को स्वीकार करते हैं।

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७. उपसंहार — सत्य की विजय

यह शास्त्रार्थ ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने आर्य समाज के भीतर 'वेद-इतिहास' बहस को उजागर किया। यद्यपि तत्कालीन नेताओं ने विश्वबन्धु को प्रोफेसरी से हटाकर लाइब्रेरी में भेज दिया और उनकी पुस्तकों पर रोक लगा दी, परन्तु सत्य को दबाया नहीं जा सकता।

राजाराम और विश्वबन्धु की विद्वत्ता, ईमानदारी और साहस आज भी प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने सैकड़ों प्रमाण देकर यह सिद्ध कर दिया कि वेद केवल रूढ़ कर्मकाण्ड या अमूर्त ब्रह्म की पुस्तक नहीं, बल्कि भारत के प्राचीनतम इतिहास का जीवंत दस्तावेज़ है।

इस बहस ने यह भी दिखाया कि धार्मिक कट्टरता किस प्रकार विद्वानों को प्रताड़ित कर सकती है, किन्तु अन्ततः सत्य की ज्योति ही प्रबल होती है।

इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि —

हाँ, राजाराम जी का पक्ष पूर्णतः सिद्ध हुआ।
हाँ, वेदों में इतिहास है।
हाँ, यास्क इतिहास मानते थे।
और हाँ, आर्य समाज की चालाकी असफल रही।

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"सत्य के आगे षड्यंत्र — कैसे आर्य समाजियों ने 'जीत' के लिए 'अर्थ' का 'अनर्थ' किया"

१. प्रस्तावना — जीत की चाह में सत्य का बलिदान

यह अध्याय उस मानसिकता को उजागर करता है, जो किसी भी धार्मिक या वैचारिक संगठन के लिए सबसे खतरनाक होती है — "सत्य की खोज से अधिक महत्वपूर्ण है अपने पक्ष की विजय।"

जब पंडित राजाराम शास्त्री और पंडित विश्वबन्धु शास्त्री ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि "निरुक्तकार यास्क वेदों में इतिहास मानते हैं", तो उनके सामने कोई साधारण शास्त्रार्थ नहीं था, बल्कि एक पूर्व-नियोजित साजिश थी, जिसका उद्देश्य उन्हें परास्त करना था — चाहे इसके लिए प्रमाणों को मोड़ना पड़े, व्युत्पत्तियों को तोड़-मरोड़ना पड़े, या व्यक्तिगत हमले करने पड़ें।

इस अध्याय में हम उन सभी चालों, कुतर्कों, धमकियों और प्रचार-अभियानों का विस्तृत वर्णन करेंगे, जिनका सहारा आर्य समाज के दिग्गजों (महात्मा हंसराज, भगवद्दत्त, ब्रह्मदत्त, बुद्धदेव, स्वामी सर्वदानन्द, स्वामी नित्यानन्द आदि) ने 'जीतने' की फिराक में लिया।

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२. षड्यंत्र की पृष्ठभूमि — क्यों विश्वबन्धु को निशाना बनाया गया?

(क) विश्वबन्धु का 'अपराध'

विश्वबन्धु शास्त्री 'दयानन्द ब्राह्म महाविद्यालय' (लाहौर) के अन्तर्गत संस्कृत विद्यालय के प्रधानाचार्य थे। उनकी गलती यह थी कि वे सत्य को छिपाकर नहीं रखते थे — वे विद्यार्थियों को पढ़ाते थे कि:

"सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने योग-ऋषियों को समाधि में वेद का ज्ञान दिया, समाधि टूटने पर वह ज्ञान कुछ कम हो गया और ऋषियों ने उसे अपनी भाषा में छन्दोबद्ध किया।"

यह स्पष्ट रूप से ऐतिहासिक दृष्टिकोण था — इसमें ऋषि-कर्तृत्व (मानवीय रचना) का संकेत था, न कि ईश्वर-प्रणित अपौरुषेय वेद।

(ख) आर्य समाज का भय

आर्य समाज का मूल सिद्धान्त था — "वेद अपौरुषेय (ईश्वर-प्रणित) और नित्य (अनादि) हैं, उनमें किसी राजा-रानी का इतिहास नहीं हो सकता।" यदि विश्वबन्धु की बात सही ठहरती, तो:

  • स्वामी दयानन्द के वेदभाष्य की आधारशिला हिल जाती।
  • आर्य समाज का मुख्य प्रचार-बिन्दु (वेदों की नित्यता) समाप्त हो जाता।
  • यूरोपीय विद्वानों (ग्रिफिथ, मैक्समूलर आदि) की ऋषि-कर्तृत्व वाली थ्योरी प्रबल हो जाती।

इस भय ने उन्हें विश्वबन्धु को बदनाम करने और परास्त करने का निर्णय लेने को बाध्य किया।

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३. पहली चाल — "सन्देह" का जाल

(क) राजाराम की सलाह — छिपकर युद्ध

जब शास्त्रार्थ की योजना बनी, तो पंडित राजाराम शास्त्री (जो विश्वबन्धु के मित्र थे) ने उन्हें सलाह दी:

"आप यह कदापि मत कहना कि 'मैं वेदों में इतिहास मानता हूँ।' यदि आपने यह कह दिया, तो सारा आर्य समाज आपके विरुद्ध हो जाएगा। आप केवल यह कहें कि — 'निरुक्तकार यास्क वेदों में इतिहास मानता है, ऐसा मुझको सन्देह है।'"

यह राजाराम की चतुराई थी — उन्होंने देख लिया था कि विरोधी पक्ष कट्टर है और सीधे मुकाबले में विश्वबन्धु को कुचल देंगे। इसलिए उन्होंने 'सन्देह' का सहारा लेकर बहस में बने रहने का रास्ता निकाला।

(ख) विरोधियों ने इसी को हथियार बनाया

किन्तु विरोधी पक्ष (भगवद्दत्त, ब्रह्मदत्त, बुद्धदेव) ने तुरंत इस 'सन्देह' को ही विश्वबन्धु की कमजोरी बना दिया। उन्होंने कहा — "यदि आपको सन्देह है, तो आप निश्चित पक्ष नहीं रखते; आप न तो बादी हैं और न प्रतिवादी।" इस प्रकार उन्होंने विश्वबन्धु को अस्थिर सिद्ध करने की कोशिश की, जबकि वास्तविकता यह थी कि विश्वबन्धु पूर्ण रूप से 'वेदों में इतिहास' को मानते थे, पर दबाव में आकर उन्हें 'सन्देह' का मुखौटा पहनना पड़ा।

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४. दूसरी चाल — "कसौटी" का बहाना

(क) अर्थ-निर्धारण की कसौटी — यौगिक या रूढ?

जब राजाराम ने निरुक्त ६.२२"कुरुञ्जो राजा बभूव" (कुरुञ्ज नाम का राजा हुआ) — का प्रमाण दिया, तो विरोधी पक्ष ने अर्थ-निर्धारण की कसौटी (मानदण्ड) उठाकर बहस को गोलमोल कर दिया। उनका प्रश्न था:

"शब्दों का अर्थ व्युत्पत्ति (यौगिक) से होगा या रूढि (प्रसिद्धि) से? पहले यह निश्चित कर लें।"

(ख) इस चाल का उद्देश्य

यह शुद्ध कुतर्क था, क्योंकि:

  1. निरुक्त का मुख्य कार्य ही व्युत्पत्ति द्वारा अर्थ बताना है — अतः कसौटी तो निरुक्त ही है।
  2. राजाराम ने स्पष्ट कहा — "व्युत्पत्ति अर्थ का बोधक नहीं, बल्कि रूढि प्रधान है।" उदाहरण — 'धनपति' नाम के व्यक्ति को व्युत्पत्ति (धन का मालिक) नहीं, बल्कि रूढि (उस नाम वाला व्यक्ति) समझा जाता है।
  3. विरोधी पक्ष यह जानबूझकर नहीं समझना चाहता था, क्योंकि यदि रूढि मान ली, तो 'कुरुञ्ज' राजा ही सिद्ध हो जाता, और उनका 'औपचारिक' (आलंकारिक) बचाव ढह जाता।

इस 'कसौटी' के चक्कर में उन्होंने तीन दिन तक बहस को स्थगित रखा, जबकि राजाराम बार-बार कहते रहे — "हमने छः स्थल दिए हैं, उन पर विचार करें; कसौटी की बात बाद में करेंगे।"

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५. तीसरी चाल — प्रमाणों का "औपचारिक" करार देना

(क) 'औपचारिक' शब्द का जादू

जब राजाराम ने छः ऐतिहासिक स्थल प्रस्तुत किए:

  1. कुरुञ्जो राजा बभूव (निरु. ६.२२)
  2. विपाट नदी की कथा (निरु. ६.२६)
  3. मुद्गल का युद्ध (निरु. ६.२३-२४)
  4. पुरुच्छेद का दोहराव (निरु. १०.४२)
  5. तूर्वश-यदु के नाम (निघण्टु — मनुष्यनाम)
  6. प्रस्कण्व, नभाक आदि ऋषियों के नाम

तो विरोधी पक्ष ने हर जगह एक ही मन्त्र दोहराया — "यह औपचारिक है" (आलंकारिक/काल्पनिक)।

(ख) कैसे 'औपचारिक' बनाया गया?

  • भगवद्दत्त ने कहा — "कुरुञ्ज राजा नहीं, बिजली है।"
  • ब्रह्मदत्त ने कहा — "गंगा, यमुना नदियाँ नहीं, शरीर की नाड़ियाँ हैं।"
  • बुद्धदेव ने कहा — "मुद्गल का युद्ध वास्तविक नहीं, उपमा है।"

वास्तविकता यह थी कि यास्क ने स्वयं 'मुद्गल' प्रकरण में स्पष्ट कहा है — "तत्रेतिहासमाचक्षते" (निरु. ६.२३) — अर्थात् "वहाँ वे इतिहास कहते हैं।" यास्क स्वयं इसे इतिहास कह रहे हैं, फिर भी विरोधी उसे 'औपचारिक' बताकर यास्क के शब्दों को ही नकार रहे थे।

यह सबसे बड़ी बेईमानी थी — प्रमाण को तो प्रमाण ही रहना चाहिए, किन्तु उन्होंने प्रमाण का अर्थ ही बदल दिया, ताकि उनका पूर्व-निर्धारित सिद्धान्त (वेदों में इतिहास नहीं) बचा रहे।

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६. चौथी चाल — व्यक्तिगत हमले और प्रचार-अभियान

(क) विश्वबन्धु को 'नास्तिक' घोषित करना

बहस से बाहर भी आर्य समाज ने विश्वबन्धु के विरुद्ध अभियान छेड़ रखा था। विश्वबन्धु ने स्वयं बहस के दौरान यह खुलासा किया:

"पिछले छः मास से मेरे विरुद्ध प्रोपेगण्डा किया जा रहा है। 'ग्रामवीर' (संभवतः कोई अखबार) में मुझे 'घोर नास्तिक' कहा गया। उपदेशकों ने मेरे विरुद्ध मंचों पर भाषण दिए।"

(ख) देवीचन्द का हमला

प्रिंसिपल लाला देवीचन्द (जो स्वयं श्रोता थे) ने लायलपुर, शिमला, लाहौर आदि स्थानों पर सार्वजनिक भाषणों में कहा:

"मेरा मत यह नहीं कि स्वामी दयानन्द बिगड़े नहीं, और यह भी नहीं कि उन्होंने कोई गलती नहीं की।"

यह व्यंग्य था — वे विश्वबन्धु को दयानन्द-विरोधी सिद्ध करना चाहते थे, जबकि विश्वबन्धु स्वयं दयानन्द को मानते थे और उन्हीं के विद्यालय में प्रोफेसर थे।

(ग) बुद्धदेव का आरोप — "आपने दो वर्ण माने"

बुद्धदेव (मीरपुरी) ने आरोप लगाया — "आपने क्रान्त-सभा में कहा था कि केवल दो वर्ण हैं — आर्य और दस्यु। आपने राम नाम के विषय में कहा... आपने एमनावाद आदि स्थानों पर सिद्धान्त-विरुद्ध प्रचार किया।"

विश्वबन्धु ने उत्तर दिया — "यह सब छः मास के भीतर मेरे विरुद्ध प्रचार का ही परिणाम है।"

इस प्रकार उन्होंने शास्त्रार्थ को व्यक्तिगत विवाद में बदलने की कोशिश की, ताकि मूल मुद्दा (वेदों में इतिहास) भटक जाए।

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७. पाँचवीं चाल — धमकियाँ और दबाव

(क) "आज विश्वबन्धु को दबा दो?"

छठी बैठक (२० मई, सायं) में विश्वबन्धु ने स्वयं सनसनीखेज खुलासा किया:

"पंडित सभा की छठी बैठक में विश्वबन्धु ने बड़े आवेश में कहा — 'आज विश्वबन्धु को दबा दो?' तथा 'क्या आज ही मुझे ब्राह्म-महाविद्यालय से निकलवा दो?'"

यह स्पष्ट था कि विरोधी पक्ष ने पहले से ही नौकरी से निकालने की धमकी दे रखी थी। यह शास्त्रार्थ नहीं, बल्कि डराने-धमकाने का खेल था।

(ख) महात्मा हंसराज की अध्यक्षता में पक्षपात

अध्यक्ष होने के बावजूद महात्मा हंसराज ने तटस्थता नहीं बरती:

  • उन्होंने विश्वबन्धु से बार-बार कहा — "आप स्पष्ट कहें, वेदों में इतिहास है या नहीं?" — जबकि विश्वबन्धु पहले ही 'सन्देह' वाला पक्ष ले चुके थे।
  • उन्होंने राजाराम के प्रमाणों को 'अधूरे' या 'अप्रासंगिक' कहकर टाला।
  • अंत में उन्होंने 'सब-कमेटी' बनाने की सलाह देकर निर्णय को अनिश्चित कर दिया — यह एक क्लासिक चाल है, जब कोई पक्ष परास्त हो रहा हो तो बहस को लम्बा करके उसे अप्रासंगिक बना दिया जाता है।
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८. छठी चाल — 'सिद्धान्त-रक्षा' के नाम पर अंधभक्ति

(क) स्वामियों का हस्तक्षेप

जब राजाराम और विश्वबन्धु निर्णायक स्थिति में आ गए, तो स्वामी सर्वदानन्द और स्वामी नित्यानन्द ने मध्य में आकर कहा:

"यदि वेदों में इतिहास मान लिया, तो वेदों का नित्यत्व नहीं रहेगा और आर्य समाज का पतन हो जाएगा।"

यह तर्क नहीं, बल्कि भावनात्मक ब्लैकमेल था — डर दिखाया गया कि यदि सत्य स्वीकार किया तो संगठन टूट जाएगा।

(ख) 'सौन्दर्य' का राग

नारायण स्वामी ने कहा — "वेदों का सौन्दर्य नष्ट हो जाता है, यदि उनमें राजा-रानियों का इतिहास मानें। वेद तो सत्य विद्याओं का ग्रन्थ है।"

राजाराम ने इसका सटीक उत्तर दिया — "यदि 'अगस्त्य' ने इन्द्र के लिए हवि न दी और इन्द्र रोने लगा — यह सूक्त (ऋ. २.१२) यदि इतिहास न माना जाए, तो इसका क्या अर्थ होगा? क्या यह ईश्वर का रोना है? यह तो हास्यास्पद है।"

किन्तु विरोधी इस तार्किक उत्तर को सुनने को तैयार नहीं थे — उन्हें सौन्दर्य से मतलब था, सत्य से नहीं।

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९. सातवीं चाल — लेखन में हेर-फेर

(क) बहस का अधूरा लेखन

बहस को लिखित रूप देने के लिए पाँच लेखक नियुक्त किए गए थे:
१. लाला खुशहालचन्द (बाद में आनन्द स्वामी)
२. ब्रह्मचारी याज्ञवल्क्य
३. ब्रह्मचारी यशःपाल
४. पंडित रघुनन्दन
५. पंडित वाचस्पति

इनमें से कोई भी शॉर्टहैण्ड (संकेतलिपि) नहीं जानता था, और न ही टेप-रिकॉर्डर था। इसलिए उन्होंने जितना सुन पाए, उतना ही लिखा — और स्वाभाविक रूप से, विरोधी पक्ष के बहुत से कुतर्क और राजाराम के निर्णायक तर्क छूट गए।

(ख) 'छपी हुई पुस्तक' में धोखा

बाद में रामलाल कपूर ट्रस्ट ने इस बहस को पुस्तक रूप में छापा, किन्तु उसमें:

  • विश्वबन्धु और राजाराम के अधिकांश प्रबल तर्क छोड़ दिए गए।
  • विरोधी पक्ष (भगवद्दत्त, ब्रह्मदत्त) के लम्बे-लम्बे भाषण छापे गए।
  • ठाकुर अमर सिंह (जो बाद में अमर स्वामी बने) और बुद्धदेव का वक्तव्य तो चतुर्थांश (एक-चौथाई) भी नहीं आया।

यह जानबूझकर किया गया — "इतिहास-पक्ष" को कमजोर दिखाने के लिए।

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१०. आठवीं चाल — अंत में 'सब-कमेटी' का खेल

जब राजाराम ने सिद्ध कर दिया कि यास्क इतिहास मानते हैं, और विश्वबन्धु ने स्वीकार कर लिया कि उन्हें 'वेदों में इतिहास' का ही बोध होता है, तो विरोधी पक्ष ने अंतिम चाल चली:

"इस विषय पर सब-कमेटी बनाएँ, जो दो महीने तक विचार करेगी और फिर निर्णय देगी।"

(क) इस चाल का उद्देश्य

  • निर्णय को अनिश्चित काल के लिए टाल देना।
  • जब सब-कमेटी बनेगी, तो उसमें विरोधी पक्ष के ही लोग होंगे (जैसे भगवद्दत्त, ब्रह्मदत्त) — वे स्पष्ट रूप से इतिहास-पक्ष को नकार देंगे।
  • व्यावहारिक रूप से, विश्वबन्धु को नौकरी से हटाने की योजना को अमलीजामा पहनाना।

राजाराम ने इस प्रस्ताव पर कहा — "मैं सब-कमेटी के हक में हूँ, किन्तु उसे पूरा समय दिया जाना चाहिए और ईमानदारी से विचार करना चाहिए।"

किन्तु विरोधी ने ईमानदारी नहीं दिखाई — उन्होंने बाद में सब-कमेटी नहीं बनाई, बल्कि सीधे विश्वबन्धु को प्रोफेसर पद से हटाकर लाइब्रेरी में भेज दिया, और राजाराम को भी हाशिए पर कर दिया।

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११. नौवीं चाल — 'विद्वानों को मृत' घोषित करना

बहस की छपी हुई पुस्तक की भूमिका में यह झूठ लिखा गया कि — "इस शास्त्रार्थ में भाग लेने वाले सभी विद्वान यशःकाय-परिनिष्ठ (दिवंगत) हो गये हैं।"

वास्तविकता यह थी:

  • ठाकुर अमर सिंह (अमर स्वामी) और आचार्य विश्वश्रवा उस समय जीवित थे।
  • अमर स्वामी ने स्वयं इस छपी पुस्तक की पृष्ठभूमि (भूमिका) लिखनी शुरू की थी, किन्तु कैंसर से पीड़ित होकर चल बसे, इसलिए वह अधूरी रह गई।

यह झूठ इसलिए फैलाया गया ताकि कोई जीवित विद्वान इस बहस की सच्चाई को चुनौती न दे सके। "जब तक जीवित थे, डरते थे; मरने के बाद उन्हें 'दिवंगत' कहकर उनके शब्दों को दबा दिया।"

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१२. दसवीं चाल — पुस्तकों पर प्रतिबन्ध

(क) विश्वबन्धु की पुस्तकें जब्त

बहस के बाद आर्य समाज ने विश्वबन्धु की सभी पुस्तकों (जिनमें वेदों का ऐतिहासिक अर्थ था) को 'सिद्धान्त-विरुद्ध' घोषित करके बन्द कर दिया। ठाकुर अमर सिंह ने इसका वर्णन करते हुए लिखा:

"महात्मा हंसराज ने जब मुझे 'दस प्रश्न' नामक विश्वबन्धु की पुस्तकें दिखाईं, तो उन्होंने उन्हें छीनकर रखवा दिया और प्रतिबन्ध लगा दिया।"

(ख) सिद्धान्त-रक्षा का ढोंग

अमर स्वामी ने इस प्रतिबन्ध की प्रशंसा की — "हमारे पूर्वज सिद्धान्तों के कितने पोषक थे — सिद्धान्त-विरुद्ध पुस्तक को कैसे बन्द कर दिया!"

किन्तु यही अमर स्वामी बाद में पछताते हैं — वे कहते हैं कि आजकल तो सिद्धान्त-विरोधी साहित्य खुलेआम बिक रहा है, कोई रोक नहीं। परिहास यह है कि जब सत्य उनके पक्ष में नहीं था, तो उसे प्रतिबन्ध से दबाया, और जब असत्य उनके पक्ष में है, तो उसे महँगे-महँगे सम्मेलनों में बेचा जा रहा है।

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१३. अन्तिम निष्कर्ष — जीत के लिए 'अर्थ' का 'अनर्थ'

सम्पूर्ण विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि आर्य समाज के तथाकथित विद्वान:

  • वेदों के वास्तविक अर्थ (जो ऐतिहासिक था) को 'औपचारिक', 'नाड़ी', 'उपमा' बनाकर तोड़-मरोड़ रहे थे — यह 'अर्थ' का 'अनर्थ' था।
  • शास्त्रार्थ को शास्त्रार्थ न रहने दिया — उन्होंने प्रमाणों को नकारा, व्यक्तिगत हमले किए, धमकियाँ दीं, और पुस्तकों पर प्रतिबन्ध लगा दिया।
  • वे 'जीतने' की फिराक में इतने अंध हो गए कि उन्होंने यास्क (निरुक्तकार) को भी झुठलाना शुरू कर दिया, जो कि सबसे बड़ी विडम्बना है — निरुक्त की व्याख्या करने वाले निरुक्त के ही शब्दों को नकार रहे थे।
  • स्वामी दयानन्द के नाम पर वे दयानन्द से भी आगे निकल गए — क्योंकि दयानन्द ने स्वयं अनेक स्थानों पर ऐतिहासिक अर्थ किए हैं (जैसे 'अश्वमेध' में 'राष्ट्र' अर्थ), किन्तु इन अनुयायियों ने गुरु से भी अधिक कट्टरता अपना ली।

अन्तिम सत्य

राजाराम शास्त्री और विश्वबन्धु शास्त्री ने प्रमाणों के आधार पर सिद्ध कर दिया था कि यास्क वेदों में इतिहास मानते हैंविरोधी इसका खण्डन नहीं कर सके — उन्होंने केवल आपत्तियाँ उठाईं, कुतर्क किए, और दबाव डाला।

फल यह हुआ कि — विश्वबन्धु को प्रोफेसर से हटाकर लाइब्रेरियन बना दिया गया, और राजाराम को अलग-थलग कर दिया गया। किन्तु सत्य को नहीं दबाया जा सका — आज हर गम्भीर विद्वान (चाहे वह सायण हो, दुर्गाचार्य हो, या पाश्चात्य विद्वान) वेदों में इतिहास को स्वीकार करता है।

यह अध्याय उन चालों का दर्पण है, जो असत्य को सत्य बनाए रखने के लिए अपनाई जाती हैं — किन्तु अन्ततः, "सत्यमेव जयते" (सत्य की ही जीत होती है) — यही इस सम्पूर्ण शास्त्रार्थ का अन्तिम निष्कर्ष है।

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स्रोत - निर्णय के तट पर
— सम्पूर्ण शास्त्रार्थ का सार —

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