मनुस्मृति में स्त्रियों की रक्षा या स्वतंत्रता पर प्रतिबंध ?

आप सभी ने मनुस्मृति का यह प्रसिद्ध श्लोक जरूर सुना होगा, जिसमें कहा गया है कि स्त्री को कभी स्वतंत्र नहीं छोड़ना चाहिए। इसी श्लोक को लेकर आजकल काफी बहस होती रहती है।

कुछ लोग इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि मनु महाराज यहाँ स्त्रियों को कैद करके रखने की बात नहीं कर रहे, बल्कि उनकी रक्षा करने की बात कर रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या मनुस्मृति के मूल श्लोकों और प्राचीन भाष्यकारो की व्याख्या से भी यही अर्थ निकलता है ? क्या यहाँ स्त्रियों की सुरक्षा की बात हो रही है, या उनकी स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है ?

आज के इस लेख में हम मनुस्मृति के नवम और पंचम अध्याय के संबंधित श्लोकों को क्रम से पढ़ेंगे और प्राचीन भाष्य के आधार पर इस पूरे विषय को समझने का प्रयास करेंगे।

सबसे पहले नवम अध्याय का श्लोक 2 देखते हे जहाँ लिखा हे - 

अस्वतन्त्राः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम् ।

विषयेषु च सज्जन्त्यः संस्थाप्या आत्मनो वशे ॥ २ ॥

इस श्लोक का सामान्य अर्थ यह है कि स्त्रियों को दिन-रात पुरुष अपने अधीन रखे और विषयों में आसक्त होने पर उन्हें खास कर अपने वश में रखना चाहिए।

अब यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि श्लोक में स्त्रियों की रक्षा करने की बात नहीं कही गई है, बल्कि उन्हें अस्वतंत्र रखने और अपने वश में रखने की बात स्पष्ट रूप से कही गई है।

इसी श्लोक का जब हम 2 प्राचीन आचार्य का भाष्य पढ़ते हे तो और स्पष्ट हो जाता हे की यहां स्त्री को अपने वश मे ही रखने की बात हे - 

कुल्लूक भट्ट इसी श्लोक के भाष्य में विषयों की व्याख्या रूप आदि विषयों के रूप में करते हैं। अर्थात् रूप, रस आदि इंद्रियों के विषयों की ओर आकर्षण 

इसलिए इस श्लोक की व्याख्या करते समय यह समझना जरूरी है कि मनु बाहरी दुश्मन से स्त्रियों की सुरक्षा की बात नहीं कर रहे, बल्कि उनके आचरण और विषयों के प्रति आकर्षण को नियंत्रित करने की बात कर रहे हैं।

और इस संदर्भ में मेधातिथि का भाष्य भी महत्वपूर्ण हो जाता है -

मेधातिथि के भाष्य को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यहाँ स्त्रियों को केवल किसी बाहरी खतरे से बचाने की बात नहीं है बल्कि उनके आचरण पर नियंत्रण रखने का विचार इसमें शामिल है 

इसलिए यह कहना कि इस अध्याय में शारीरिक सुरक्षा की बात है, मूल पाठ के पूरे अर्थ को व्यक्त नहीं करता। 

अब आगे बढ़ते हैं मनुस्मृति के नवम अध्याय के तीसरे श्लोक की ओर- 

यह वही प्रसिद्ध श्लोक है, जिसे अक्सर स्त्रियों की रक्षा के संदर्भ में उद्धृत किया जाता है।

मनुस्मृति 9.3 - 

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।

रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥

अर्थात् बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र स्त्री की रक्षा करते हैं। स्त्री स्वतंत्रता की अधिकारी नहीं है।

अब यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझिए।

इस श्लोक में "रक्षति" शब्द को देख के कुछ लोग ये व्याख्या करते हे की यहां तो स्त्री की रक्षा करने की बात आयी हे न की कैद करके रखने की, हालांकि हमने उपरोक्त ही ये सिद्ध कर दिआ हे की ये अध्याय ही स्त्री की आजादी छीनने के विरुद्ध हे 

अब प्रश्न यह है कि यहाँ इस श्लोक मे रक्षा का अर्थ क्या बाहरी लोगों से सुरक्षा है, या स्त्री के जीवन और आचरण पर नियंत्रण करना है?

इसका उत्तर समझने के लिए हमें इसी अध्याय के अगले श्लोकों को देखना होगा।

क्योंकि किसी श्लोक का अर्थ समझने के लिए केवल एक पंक्ति को अलग करके देखना पर्याप्त नहीं होता। उसके आसपास के श्लोक और भाष्य भी देखने पड़ते हैं। 

जो लोग इस श्लोक मे रक्षति शब्द देख के ये बोलते हे की यहां रक्षा की बात हे कैद करने की नहीं वो दर्शल मे हमें ये बताना भूल जाते हे की रक्षा कैसे करना हे ? किस प्रकार से स्त्री की रक्षा होती हे शास्त्रों अनुसार ? 

तो इसका उतर आगे के श्लोको मे मनु ने स्पष्ट बताया हे जहाँ वो लिखते हे की - 

न कश्चिद्योषितः शक्तः प्रसह्य परिरक्षितुम् ।

 एतैरुपाययौगैस्तु शक्यास्ताः परिरक्षितुम् ।। १०।।

अर्थात कोई भी व्यक्ति बलपूर्वक स्त्रियों की रक्षा करने में समर्थ नहीं होता है, किन्तु इन आगे कहे गए उपायों द्वारा उनकी रक्षा करना सम्भव है।। १० ।।

अब आगे वो उपाय मनु ने बताये हे जिस से स्त्री की रक्षा करनी हे जो कुछ इस प्रकार हे - 

अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत्।

 शौचे धर्मेऽन्नपक्त्यां च पारिणाह्यस्य वेक्षणे ।। ११ ।।

अर्थात इन स्त्रियों को धन-संग्रह में, उसका व्यय करने में, घर की साफ-सफाई में, धार्मिक कार्यों में, भोजन पकाने में तथा घर की सभी वस्तुओं की देखभाल के दायित्वपूर्ण कार्यों में लगा देना चाहिए।। ११ ।।

आप यहां स्पष्ट देख सकते हे की स्त्री की रक्षा करने के उपाय हमें बताये गए हे जो की घर की साफ सफाई भोजन पकने तथा घर की वस्तु की देखभाल आदि कार्यों मे लगा देना चाहिए 

अतः इस से सिद्ध हुआ की यहां स्त्री को किसी बाहरी दुश्मन से रक्षा करने की बात नहीं उनको घर मे बंद करके रखने की ही बात हे 

क्युकी श्लोक 2 पे भाष्य करते हुए मेधातिथि ने यही बताया हे की भले वो घर मे रह के शराब भी पिने लगे वो सही लेकिन बाहर निकल के विषयो के प्रति आकृष्ट न हो 

अब अगले श्लोक पे बढ़ते हे जो कुछ इस प्रकार हे - 

अरक्षिता गृहे रुद्धाः पुरुषैराप्तकारिभिः । 

आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः ।। १२ ।।

अर्थात अत्यन्त समझदार लोगों द्वारा घर में बन्द करके रखी गयीं भी स्त्रियाँ असुरक्षित रहती हैं, किन्तु जो अपनी रक्षा स्वयं करती हैं, वे ही वस्तुतः सुरक्षित रहती हैं।। १२ ।। 

अब यहां से भी कुछ लोग गलत मतलब निकलते हे की देखो घर मे बंद करने की बात नहीं आयी हे यहां तो स्त्री को स्वयं रक्षा करने की बात हे 

पर इनका ये भ्रम भी टूट जाता हे जब हम इस श्लोक पे प्राचीन आचार्य मेधातिथि का भाष्य पढ़ते हे वो इसपे लिखते हे की - 

स्त्री की स्वयं रक्षा से अर्थ यहां उपरोक्त के श्लोको का ही हे अन्य का नहीं, क्युकी इनकी रक्षा ग्यारह नंबर श्लोक मे बताये गए उपाय द्वारा ही हो सकता हे कोई अन्य उपाय से नहीं 

तथा दूसरी बात यहां आप ये ध्यान दीजिये की जो लोग स्त्री को घर मे बंद करके रखते हे उनको समझदार की उपाधि दी जा रही हे 

अतः सिद्ध हे की इस श्लोक मे भी महिला को घर मे बंद करके रखने की बात हे 

स्त्री को घर मे बंद रखने के लिए क्यों कहा गया हे ? आखिर क्या जरूरत पड़ गयी जो उनकी रक्षा ( कैद ) करने के लिए ऐसी बाते बोलनी पड़ी? 

तो इसी का उत्तर आगे के श्लोको से स्पष्ट हो जाता हे जहाँ मनु बोलते हे की - 

नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थितिः। 

सुरूपं वा विरूपं वा पुमानित्येव भुञ्जते ।। १४।।

पाँश्चल्याच्चलचित्ताच्च नैस्नेह्याच्च स्वभावतः ।

 रक्षिता यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते ।। १५।।

एवं स्वभावं ज्ञात्वासां प्रजापतिनिसर्गजम् । 

परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषो रक्षणं प्रति ।। १६ ।।

अर्थात - 

ये स्त्रियां न तो पुरुष के रूप को देखती हैं, न इनका आयु के विषय में चिन्तन होता है। वह सुन्दर हो अथवा असुन्दर हो (इस ओर भी इनका ध्यान नहीं होता है) वे तो इसे पुरुषमात्र मानकर ही भोगती हैं।। १४।। 

चरित्रभ्रष्ट होने के कारण, चित्तः चंचलता के कारण, स्वभाव से ही प्रेमरहित होने से, पति द्वारा यत्नपूर्वक रक्षा को गई भी स्त्रियाँ, इस संसार में पति को धोखा देने में सफल हो जाती हैं।। १५ ।।

ब्रह्मा की सृष्टि से ही इन स्त्रियों के इसप्रकार के स्वभाव को जानकर व्यक्ति को इनकी रक्षा के प्रति अत्यन्त प्रयत्नशील होना चाहिए ।। १६ ।।

आप यहां स्पष्ट देख सकते हे की स्त्री के इन तरह के स्वभाव के कारण ही स्त्री की रक्षा करना आवश्यक होता हे, और रक्षा कैसे करना हे ये आपको उपरोक्त श्लोको से ज्ञात हो गया होगा 

अतः सिद्ध हुआ की यहां पूरा प्रकरण ही स्त्री को घर मे बंद रखने का चल रहा हे इस बात की पुष्टि और अच्छे से हो जाती हे जब हम मनुस्मृति 9/3 पे ही मेधातिथि का भाष्य पढ़ते हे जहाँ वो बताते हे की - 

मनुस्मृति 5/147 मे तो स्पष्ट अस्वतंत्रता की बात आयी हे वहा तो रक्षति शब्द भी नहीं हे, इस से आपको ये स्पष्ट हो गया होगा अब की मनुस्मृति 9/3 मे जो रक्षा की बात हे वो मनुस्मृति 9/11 के अनुसार ही होंगी किसी अन्य उपाय द्वारा नहीं 

तथा दूसरी बात ये की यहां रक्षति से अस्वतंत्रता ही अर्थ ग्रहण होगा इस बात की पुष्टि आर्या समाज के जानेमाने विशुद्ध मनुस्मृति के लेखक सुरेन्द्र कुमार कर देते हे जहाँ वो मनुस्मृति 9/3 को परक्षिप्त माने हे

अब अगर यहां इस श्लोक मे कैद करके रखने की बात ही नहीं थी तो उनको इस श्लोक को मिलावटी क्यों बोलना पड़ा ? क्या वो भी महिला के आजादी के खिलाफ हे ? इस श्लोक पे सुरेन्द्र कुमार लिखते भी हे की ये श्लोक महिला की आजादी को छीनता हे 

कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता हे की ये अध्याय पूरा प्रकरण पढ़ने के बाद स्त्री की आजादी के विरुद्ध हे 

जाते जाते एक और श्लोक महाभारत मे मिलता हे जहाँ बोला गया हे की -

असदेव हि धर्मस्य प्रदानं धर्म आसुरः । 

नानुशुश्रुम जात्वेतामिमां पूर्वेषु कर्मसु ।। ८ ।।

अर्थात महिला कभी स्वतंत्र नहीं होती, ये पुरातन धर्म है इस बात का जो खंडन करता है वो असुर कर्म करता है 

~ महाभारत 13/45/8

तो इस धर्म ( कैद करके रखने वाला ) का जो खंडन ( घर से बाहर निकलने देगा ) वो असुर हे 

धन्यवाद 



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