अतिथि सत्कार के नाम पर पत्नी का समर्पण
ये कहानी लिंग महापुराण में आई है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार एक ब्राह्मण सुदर्शन ने अतिथि का सत्कार किया। यहाँ कथा ऋषियों को स्वयं ब्रह्मा जी कह रहे हैं—
एक समय की बात है। श्रेष्ठ ब्राह्मणों और गृहस्थों को सदा यह शिक्षा दी जाती थी कि अतिथि की कभी निन्दा या अनादर नहीं करना चाहिए। अतिथि चाहे कुरूप हो या सुन्दर, मलिन हो या मूर्ख—उसका अपमान कभी नहीं करना चाहिए।
बहुत पहले इसी पृथ्वी पर मृत्यु के देवता काल को एक उत्तम ब्राह्मण मुनि सुदर्शन ने अतिथि के रूप में पूजा करके जीत लिया था। इस संसार में गृहस्थों के लिए भवसागर से पार होने का कोई अन्य मार्ग नहीं है, सिवाय अतिथि की पूजा के।
उन्हीं दिनों सुदर्शन नाम का एक गृहस्थ रहता था। उसने मृत्यु को जीतने की दृढ़ प्रतिज्ञा की थी। एक दिन उसने अपनी पवित्र पत्नी से कहा—
“हे सुबोध! सुन्दर भौंहों वाली और सौभाग्यशाली! गौर से सुनो जो मैं कहता हूँ। तुमको कभी भी अतिथियों का अपमान नहीं करना चाहिए। क्योंकि प्रत्येक अतिथि स्वयं पिनाकधारी साक्षात् शिव हैं। इसलिए तुम स्वयं अपने को देकर उनकी पूजा करो।”
यह सुनकर दुखी और विवश उस पतिव्रता पत्नी ने रोते हुए अपने पति से पूछा—“स्वामी! आपने क्या कहा?”
उसकी बात सुनकर सुदर्शन ने फिर कहा—
“हे आर्ये! सब वस्तु शिव है और अतिथि स्वयं शिव हैं। अतः अतिथि सत्य पुरुष हैं। इसलिए सब अतिथि लोग सदा पूजनीय हैं।”
पति की यह बात सुनकर उस पतिव्रता स्त्री ने हृदय से उसे स्वीकार कर लिया। उसने अपने सिर पर पति का आशीर्वाद धारण किया और उस श्रेष्ठ कर्तव्य के पालन में लग गई।
एक दिन दोनों की श्रद्धा की परीक्षा लेने के लिए स्वयं धर्म एक ब्राह्मण का रूप धारण करके मुनि सुदर्शन के घर पधारे। उस पवित्र स्त्री ने पूजा की सामग्री से अतिथि की विधिवत पूजा की।
पूजा पूर्ण होने के बाद द्विज-वेषधारी धर्म ने कहा—
“तुम्हारे बुद्धिमान पति सुदर्शन कहाँ हैं? हे भद्रे! यह भोजन आदि मेरे लिए पर्याप्त है। अब मैं कहता हूँ कि तुम स्वयं अपने को मुझको समर्पित कर दो।”
अतिथि के इस प्रकार कहने पर पतिव्रता स्त्री ने अपने पति द्वारा पहले कही गई बात का स्मरण किया। लज्जा से आँखें मूँदकर वह वहाँ से उठी और चलने लगी। मन में अनेक विचार आते-जाते रहे, परन्तु अन्त में उसने अपने को उस धर्मात्मा को समर्पित करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। पति के आशीर्वाद से प्रेरित होकर वह उस ब्राह्मण को स्वयं को अर्पित करने के लिए आगे बढ़ी।
इसी समय उसका बुद्धिमान पति सुदर्शन घर आ गया। घर के बाहर से उसने अपनी पत्नी को पुकारा—“हे भद्रे! कहाँ गई हो? यहाँ आओ, आओ।”
यह सुनकर अतिथि ने स्वयं कहा—
“हे सुदर्शन! महात्मा! मैं तुम्हारी स्त्री के साथ मैथुन कर रहा हूँ। फिर उस ब्राह्मण अतिथि ने सुदर्शन से कहा— यहाँ क्या करना चाहिए? कृपया आप बताइए। मेरी सम्भोग क्रिया पूरी हो गई है। हे द्विजोत्तम मैं संतुष्ट हो गया हूँ।”
यह सुनकर ब्राह्मण सुदर्शन प्रसन्नतापूर्वक बोला—
“हे द्विजोत्तम अपनी इच्छाओं के अनुसार उसके साथ (मेरी पत्नी के साथ) आनन्द भोगो।”
इस धर्म-गुण और इस घटना से प्रसन्न होकर उन्होंने (अतिथि ब्राह्मण) अपना वास्तविक रूप स्वयं प्रकट कर दिया। सभी वरदान दिए और फिर कहा—
“हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! मैंने इस सुशोभन स्त्री का मन से भी उपभोग नहीं किया है। इसमें कोई संदेह नहीं है। मैं यहाँ केवल इसकी श्रद्धा की परीक्षा लेने आया था। तुमने अकेले इस धर्म से मृत्यु को जीत लिया। यह तुम्हारी तपस्या का प्रभाव है।”
ऐसा कहकर धर्म वहाँ से चले गए।
क्या बात है
अरे वाह सुदर्शन बाबा! मृत्यु को जीतने का जुगाड़ निकाला—सीधा बीवी को “अतिथि सेवा” के नाम पर फ्री डिलीवरी पर रख दिया। सोचा होगा—“भई, काल को हराऊँगा तो घर की लक्ष्मी को थोड़ा ‘शिव रूप’ में अरपित कर दूँ, क्या फर्क पड़ता है!” बीवी रो-रोकर पूछ रही है—“स्वामी क्या कह रहे हो?” सुदर्शन मुस्कुराते हुए—“अरे आर्ये, सब शिव हैं… और शिव को प्रसन्न करने का सबसे आसान तरीका है—खुद को दे दो। बाकी सामान तो मैं बाद में अरपित कर दूँगा।”
पति ने बीवी को “अतिथि सत्कार” के नाम पर किराए पर चढ़ाया, खुद आकर “भोग लो भाई” बोल दिया, और फिर धर्म ने आकर कहा—“अरे मैंने तो सिर्फ टेस्ट लिया था, कुछ किया ही नहीं।”
सुदर्शन की उपलब्धि: मृत्यु हारी, बीवी की इज्जत भी हारी, और घर में “अतिथि = फ्री पास” वाला नया नियम लागू हो गया। अब बताओ— क्या इस तपस्या से काल जीता… या सिर्फ बीवी की किस्मत फूँक दी?
यह भी शास्त्र का एक और उदाहरण है — जहाँ नारी को पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि पूजा का साधन बनाया गया है।




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