हिन्दू धर्म के शास्त्रों का वर्गीकरण

हिन्दू शास्त्रों का वर्गीकरण और प्रामाणिकता का क्रम
शास्त्रों का वर्गीकरण प्रामाणिकता क्रम →
शास्त्र-विवेचन

श्रुति, स्मृति और प्रामाणिकता का पारंपरिक क्रम

वेद से लेकर पुराण, दर्शन और धर्मशास्त्र तक — विस्तृत संरचना

हिन्दू धर्म के शास्त्रों का वर्गीकरण मुख्य रूप से श्रुति (सुना हुआ, अपौरुषेय) और स्मृति (स्मरण किया हुआ, पौरुषेय) पर आधारित है। वेद हिन्दू धर्म का आधार हैं। इन्हें दो भागों में विभाजित किया जाता है:

  • मंत्रभाग: संहिताएँ (मंत्र संग्रह)।
  • ब्राह्मणभाग: ब्राह्मण (यज्ञ-व्याख्या), आरण्यक (वन-चिंतन), उपनिषद् (ब्रह्म स्वरूप निरूपण), सूत्र (श्रौत, गृह्य, धर्म) और प्रातिशाख्य।

वेद चार प्रकार के हैं: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। वेद की कुल संहिताएँ 1131 बताई गई हैं, लेकिन वर्तमान में कुछ ही उपलब्ध हैं। ब्राह्मणभाग की संख्या भी संहिताओं के अनुरूप मानी जाती है।

इसके अतिरिक्त वेदांग, मनुस्मृति आदि स्मृति, महाभारत आदि धार्मिक इतिहास, विष्णु आदि पुराण तथा उप-पुराण भी शामिल हैं। ब्राह्मण धर्म के लिखे सभी शास्त्रों की गिनती की जाए तो यह संख्या लगभग 2000 से ऊपर पहुँच जाती है।

१. वेद (Vedas)

वेद मन्त्रभाग (संहिताएँ) वर्तमान में उपलब्ध ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद्
ऋग्वेद 21 संहिताएँ बाष्कल, शाकल ऐतरेय, कौशीतकि ऐतरेय, कौशीतकि 10 (ऐतरेय आदि)
यजुर्वेद – शुक्ल 15 संहिताएँ वाजसनेयी (माध्यन्दिन), काण्व शतपथ, काण्व शतपथ (दो) बृहदारण्यक ईश, बृहदारण्यक, जाबाल, मुक्तिका आदि
यजुर्वेद – कृष्ण 86 संहिताएँ तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक, कठकपिलष्ठ तैत्तिरीय ब्राह्मण तैत्तिरीय आरण्यक कठ, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर आदि 32
सामवेद 1003 संहिताएँ कौथुम, जैमिनीय, राणायनीय (आंशिक) ताण्ड्य, षड्विंश, मन्त्र ब्राह्मण आदि 6 — केन, छान्दोग्य आदि 16
अथर्ववेद 6 संहिताएँ शौनक, पैप्पलाद गोपथ ब्राह्मण — प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य आदि 31

२. वेद से सम्बन्धित सूत्र

प्रकार ऋग्वेद यजुर्वेद (शुक्ल) यजुर्वेद (कृष्ण) सामवेद अथर्ववेद
श्रौतसूत्र शाङ्खायन, आश्वलायन कात्यायन सात—हिरण्यकेशी, बौधायन, आपस्तम्ब आदि द्राह्णायण, लाट्यायन, मशकसूत्र आदि ३ —
गृह्यसूत्र शाङ्खायन, आश्वलायन पारस्कर आपस्तम्ब, मानव आदि 7 गोभिल, खादिर, जैमिनीय वैखानस, वराह
धर्मसूत्र — गौतम बौधायन, आपस्तम्ब — —
प्रातिशाख्य ऋक् प्रातिशाख्य शुक्लयजु: प्रातिशाख्य तैत्तिरीय प्रातिशाख्य साम प्रातिशाख्य अथर्व प्रातिशाख्य

३. उपवेद (Upavedas)

उपवेद सम्बन्धित वेद मुख्य ग्रन्थ
आयुर्वेद अथर्ववेद सुश्रुत, चरक, काश्यप, भेल
धनुर्वेद यजुर्वेद विभिन्न धनुर्वेद शाखाएँ
गान्धर्ववेद सामवेद संगीत, नृत्य, नाटक ग्रन्थ
अर्थवेद / अर्थशास्त्र ऋग्वेद कौटिल्य अर्थशास्त्र, बृहस्पति

४. वेदाङ्ग (Veda–auxiliary disciplines)

वेदाङ्ग विषय प्रमुख ग्रन्थ/शाखाएँ
शिक्षा उच्चारण पाणिनि शिक्षा, व्यास शिक्षा, याज्ञवल्क्य शिक्षा, गौतमि, लोमशि, नारदी
कल्प विधि–नियम गृह्य, श्रौत, धर्मसूत्र; नक्षत्रकल्प, संहिताकल्प आदि
व्याकरण भाषा-व्यवस्था पाणिनि, शाकल्य आदि
निरुक्त शब्दार्थ यास्क, अन्य प्राचीन निरुक्त
छन्द छन्दशास्त्र पिङ्गल, सामवेद का उपनिदानसूत्र
ज्योतिष गणित-खगोल बृहत्संहिता, सूर्यसिद्धान्त, सिद्धान्तशिरोमणि

५. उपाङ्ग (Upāṅga — Secondary scriptures)

(क) पुराण

श्रेणी संख्या नाम
महापुराण 18 ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव/वायु, लिङ्ग, गरुड, नारद, भागवत, अग्नि, स्कन्द, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, मार्कण्डेय, वामन, वाराह, मत्स्य, कूर्म, ब्रह्माण्ड
उपपुराण 18 आदि, नरसिंह, स्कन्द, शिवधर्म, दुर्वास, नारदीय, कपिल, वामन, महेश्वर, औशनस, ब्रह्माण्ड, वरुण, कालिका, साम्ब, सौर, पाराशर, मारीच, भास्कर
औपपुराण 18 आदि-सनत्कुमार, बृहन्नारदीय, आदित्य, मानव, नन्दिकेश्वर, कौर्म, भागवत, वसिष्ठ, भार्गव, मुद्गल, कल्कि, देवी, महाभागवत, बृहद्धर्म, परानन्द, पशुपति, वन्ही, हरिवंश

६. इतिहास (Itihāsa)

ग्रन्थ विषयवस्तु
रामायण वाल्मीकि रचित, 24,000 श्लोक, राम कथा
महाभारत वेदव्यास रचित, 1,00,000 श्लोक, 18 पर्व, सम्पूर्ण धर्म का महाग्रन्थ

७. दर्शन (Six Philosophical Schools)

दर्शन प्रणेता विषय प्रमुख भाष्य
सांख्य कपिल प्रकृति-पुरुष सिद्धान्त विज्ञानभिक्षु
योग पतञ्जलि चित्तवृत्ति निरोध व्यासभाष्य
वैशेषिक कणाद पदार्थ-सिद्धान्त (6 द्रव्य) प्रशस्तपाद
न्याय गौतम 16 पदार्थ, तर्क-शास्त्र वात्स्यायन
पूर्वमीमांसा जैमिनि कर्म-मीमांसा शबरभाष्य
उत्तरमीमांसा (वेदान्त) व्यास ब्रह्म-जीव-अद्वैत शंकर, रामानुज, माध्व आदि

८. धर्मशास्त्र

प्रकार संख्या उदाहरण
धर्मसूत्र कई गौतम, वसिष्ठ, आपस्तम्ब, बौधायन आदि
स्मृतियाँ लगभग 60 मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, कात्यायन, हरित आदि

शास्त्रों की प्रामाणिकता का क्रम

हिंदू धर्म में शास्त्रों की प्रामाणिकता का क्रम मुख्य रूप से मीमांसा दर्शन और स्मृतियों के आधार पर निर्धारित किया गया है। इसमें श्रुति (वेद) सर्वोच्च और अचूक मानी जाती है।

“श्रुतिविरुद्धा स्मृतिरप्रमाणमिति” — मीमांसा सूत्र 1/3/2, शबर भाष्य

अर्थात् जो स्मृति श्रुति के विरुद्ध हो, वह प्रमाण नहीं है।

स्मृति (धर्मशास्त्र जैसे मनुस्मृति) द्वितीय स्तर पर है, जो श्रुति के अनुरूप होने पर ही प्रामाणिक होती है।

“मन्वर्थविपरिता तु या स्मृतिः सा न दृश्यते” — बृहस्पति स्मृति

वेद के बाद स्मृति की प्रमाणिकता सबसे अधिक है और स्मृतियों में मनुस्मृति की प्रमाणिकता सबसे अधिक है। यह बात स्वयं वेद कहते हैं:

— कृष्ण यजुर्वेद / तैत्तिरीय / 2.2.10.2

मनुस्मृति के अनुसार तो इस स्मृति में मनु की लिखी कोई भी बात वेद के विरुद्ध हो ही नहीं सकती, क्योंकि जो भी मनु ने कहा है, वो वेद में पहले से ही बताया गया है।

आचार्य मनु के द्वारा जो कोई भी किसी के भी लिए धर्म कहा गया है, वह सब (पहले ही) वेद में कहा जा चुका है क्योंकि वह (वेद) सर्वज्ञान सम्पन्न है। — मनुस्मृति 2.7

जैसे वेद धर्म का मूल है, वैसे ही मनुस्मृति धर्म का मूल है।

सम्पूर्ण वेद, वेद - ज्ञाताओं के स्मृति ग्रन्थ सद्गुण तथा सज्जनों का आचरण एवं आत्म सन्तुष्टि ही धर्म के आधार हैं। — मनुस्मृति 2.6
इन सब प्रमाणों पर विचार करने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि वेद और मनुस्मृति की प्रमाणिकता में कोई भेद नहीं है।

इतिहास-पुराण तृतीय स्तर पर आते हैं और विरोध की स्थिति में इनका महत्व कम होता है।

— व्यासस्मृति 1.4

प्रामाणिकता का संक्षिप्त क्रम

  1. श्रुति (वेद) — सर्वोच्च, अपौरुषेय, अचूक।
  2. स्मृति — विशेषकर मनुस्मृति। श्रुति के अनुरूप होने पर ही प्रामाणिक।
  3. इतिहास-पुराण — तृतीय स्तर। विरोध की स्थिति में महत्व कम।

इस वर्गीकरण और प्रामाणिकता क्रम से स्पष्ट होता है कि हिन्दू धर्मशास्त्र परंपरा में वेद और मनुस्मृति को धर्म का मूल आधार माना गया है। अन्य सभी ग्रंथ इन्हीं के अनुगामी या व्याख्यात्मक माने जाते हैं।

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2 Comments

  1. उत्तम लेख, किंतु इसमें एक महत्त्वपूर्ण तथ्य और जोड़ा जाना अपेक्षित है। श्रुति, स्मृति और इतिहास के अतिरिक्त, ब्राह्मणधर्मीय परम्परा में आगम, निगम तथा तन्त्रग्रन्थों की भी एक विशिष्ट श्रेणी विद्यमान है, जो विभिन्न सम्प्रदायों की परम्पराओं से सम्बद्ध है। अनेक सम्प्रदाय अपने आगमों को श्रुति के समकक्ष प्रामाणिक मानते हैं और इस मान्यता की पुष्टि में पुराणों तथा इतिहासग्रन्थों के कतिपय वचनों का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। आगमों की श्रुतिसंज्ञा अथवा श्रुतितुल्य प्रामाणिकता के समर्थन में प्रायः उद्धृत किया जाने वाला एक कथन आचार्य कुल्लूक भट्ट की मनुस्मृति टीका में मिलता है, जिसमें श्रुति के वैदिकी और तान्त्रिकी, दोनों रूपों का उल्लेख किया गया है।

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    1. आगम(योगदर्शन के अनुसार) निगम (निरुक्त) के अनुसार वेद के ही नाम है। तंत्रग्रंथ अवश्य है। परन्तु वो सर्वमान्य नहीं। किसी एक sect के लोग मानते है। यहां सर्वसामान्य ग्रंथ को लिखा गया है। जो हिंदू धर्म की आधारशिला है।

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