शास्त्रों में नारी-सम्मान का दावा बनाम वास्तविकता
जब भी भारतीय संस्कृति के व्याख्याता नारियों के विषय में बात शुरू करते हैं, तो प्रायः मनु का एक श्लोक उद्धृत करते हैं:
“यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥” — मनु 3/56
अर्थात् जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवताओं का निवास होता है और जहां इनकी पूजा नहीं होती, वहां सब क्रियाएं निष्फल होती हैं।
यह श्लोक आज तक ढोल पीटकर सुनाया जाता है। इसके सहारे यह सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है कि भारतीय संस्कृति में नारी सदैव सम्मानित पद की अधिकारिणी रही है। किंतु मैं जब भी यह श्लोक सुनता हूँ, मुझे यह एक नंगा झूठ, एक पाखंड, और शास्त्रों के कुकृत्यों को छिपाने का जुगनू लगता है। जिस मनु ने यह श्लोक रचा, उसी मनु ने अपनी मनुस्मृति में नारी को मूर्ख, अशुभ, क्रोधी, कुटिल, अविश्वासिनी, पुरुष की दासी और संपत्ति तक कह दिया। फिर यह “पूजा” किस बात की? यह पूजा नहीं, पितृसत्ता का धर्मीकरण है। यह सम्मान नहीं, शोषण को दिव्यता का ताज पहनाना है।
जहां नारी को जिंदा जलाने, गुलाम बनाने, अपमानित करने और मनुष्य से वस्तु बनाने वाले शास्त्र हों, वहां केवल मीठी बातें करना अपराध है।
प्रशंसा और पूज्यता ‘अर्थवाद’ (विधि की महिमा) है — एक और छलावा
जब मैंने गहराई से अध्ययन किया, तो पता चला कि यदि कोई यह कहे कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यते” वास्तव में नारी-सम्मान का प्रमाण है, तो उसे मनुस्मृति के भाष्यकार कुल्लूकभट्ट का मत पढ़ना चाहिए। कुल्लूकभट्ट मनुस्मृति (3.56) पर टिप्पणी करते हुए स्पष्ट लिखते हैं कि यह “निन्दार्थवादः” है। अर्थात् यह श्लोक नारी की स्तुति नहीं, बल्कि एक विशेष शैली है जिसमें नियम का पालन कराने के लिए अत्यधिक प्रशंसा या अनादर के भयंकर दुष्परिणाम बताए जाते हैं। धर्मशास्त्र में इसे ‘अर्थवाद’ कहते हैं—एक अलंकारिक पद्धति जिसमें विधि (नियम) को बल देने के लिए झूठी महिमा या झूठा भय दिखाया जाता है।
कोई पिता अपने बच्चे से कहता है ‘पढ़ाई करो नहीं तो भूखे मरोगे’ — यह “निन्दार्थवादः” का एक उदाहरण है। पिता की बस ये इच्छा है कि उसका बच्चा पढ़े, इसीलिए वो इतने कठोर वाक्य कहता है। वास्तव में उसके पिता के कहे वाक्य का दूसरा हिस्सा असत्य है। पढ़ाई न करने का भूखे रहने से कोई सम्बन्ध नहीं। संसार में बहुत ऐसे लोग हैं जिन्होंने पढ़ाई के क्षेत्र में कोई खास झंडे नहीं गाड़े लेकिन वो अच्छे पैसे कमा रहे हैं। मनु का ये कहना “इनकी पूजा नहीं होती, वहां सब क्रियाएं निष्फल होती हैं।” कुल्लूकभट्ट के हिसाब से “निन्दार्थवादः” है। और इसी श्लोक का पहला हिस्सा “जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवताओं का निवास होता है” स्तुति अर्थवाद है।
स्त्रियों की पूजा कैसे होगी, उसकी असली विधि क्या है? यही कि स्त्रियों को भोजन, वस्त्र और आभूषणों से प्रसन्न रखा जाए। कहा गया है कि उनके प्रसन्न रहने से कुल की वृद्धि होती है और रुष्ट होने से कुल नष्ट हो जाता है। यानी नारी की “पूजा” का अर्थ केवल इतना है कि उसे भोग-सामग्री से संतुष्ट रखो, ताकि वह पुरुष-व्यवस्था के अनुकूल बनी रहे। यह पूजा नहीं, पालतू जानवर को दाना डालने की मानसिकता है।
यह शास्त्र का कुकृत्य है — नारी को “पूजनीय” कहकर वास्तव में उसे भोग्या और दासी बनाए रखने का षड्यंत्र। इस पाखंड की कड़ी निंदा होनी चाहिए।
क्या केवल वही स्त्री पूजनीय है जिसका आचरण स्मृत्यानुकूल हो?
इससे भी बड़ा छलावा यह है कि यह “पूज्यता” सबके लिए नहीं है। मनुस्मृति और भाष्यकारों के मत में पूज्यता और आदर का मुख्य आधार स्त्री का धर्मानुकूल, संयमित और पातिव्रत (साध्वी) आचरण ही है। अर्थात् नारी तभी तक “पूजनीय” है जब तक वह पुरुष-निर्मित धर्म के अनुसार चले। जिस क्षण वह स्वतंत्र विचार करे, अपने अधिकार मांगे, या पति के अत्याचार के विरुद्ध खड़ी हो—वह “पूजनीय” नहीं, “दंडनीय” हो जाती है।
“पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता।
सा भर्तृलोकानाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते॥” — मनुस्मृति 5.165 तथा 9.29
अर्थात् जो स्त्री मन, वाणी और शरीर पर पूर्ण नियंत्रण रखकर अपने पति व धर्म के विरुद्ध आचरण (व्यभिचार आदि) नहीं करती, वही सज्जनों द्वारा ‘साध्वी’ (पतिव्रता) कही जाती है और पूजनीय मानी जाती है। ध्यान दीजिए—यहां स्त्री की पूज्यता उसके मानवीय गुणों, बुद्धि, करुणा, साहस या स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि केवल पति के प्रति पूर्ण समर्पण और शारीरिक नियंत्रण से तय होती है। यह पूजा नहीं, बंधन है। यह सम्मान नहीं, गुलामी का धार्मिक वैधीकरण है।
महाभारत (13.5) ने मनुस्मृति के इसी श्लोक का उल्लेख करते हुए स्पष्ट लिख दिया है कि स्त्रियों की पूजा इसीलिए करो ताकि स्त्री अपने पति को प्रसन्न कर सके। प्रसन्न करने का क्या तात्पर्य है, बुद्धिमान जन समझ सकते हैं। आगे महाभारत कहती है — तुम लोग (पति लोग) स्त्री का सम्मान करोगे तभी वो तुम्हारा बच्चा पैदा करेगी। तुम्हारा शारीरिक सुख स्त्री के ही अधीन है। इसीलिए स्त्री का सम्मान करो। असली काम तो ये है। सम्मान, पूजा, आदर, सत्कार के पीछे छुपी हुई जालसाजी।
पितृभिर्भ्रातृभिश्चापि श्वशुरैरथ देवरैः ।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः || ३॥
बहुविध कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पिता, भाई, श्वशुर और देवरोंको उचित है कि वे नववधूका पूजन-वस्त्राभूषणोंद्वारा सत्कार करें ॥ ३ ॥
यदि वे स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत् ।
अप्रमोदात् पुनः पुंसः प्रजनो न प्रवर्धते ।। ४ ॥
पूज्या लालयितव्याच स्त्रियो नित्यं जनाधिप ।
नरेश्वर! यदि स्त्रीकी रुचि पूर्ण न की जाय तो वह अपने पतिको प्रसन्न नहीं कर सकती और उस अवस्थामें उस पुरुषकी संतानवृद्धि नहीं हो सकती इसलिये सदा ही स्त्रियोंका सत्कार और दुलार करना चाहिये ।
स्त्रियो यत्र च पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ॥ ५ ॥
अपूजिताश्च यत्रैताः सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।
जहाँ स्त्रियोंका आदर-सत्कार होता है वहाँ देवतालोग प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं तथा जहाँ इनका अनादर होता है वहाँकी सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं ॥
स्त्रियः पुंसां परिददे मनुर्जिगमिषुर्दिवम् ।अबलाः स्वल्पकौपीनाः सुहृदः सत्यजिष्णवः ।। ८ ।।
ईर्षवो मानकामाश्च चण्डाश्च सुहृदोऽबुधाः । स्त्रियस्तु मानमर्हन्ति ता मानयत मानवाः ।। ९ ।।
स्त्रीप्रत्ययो हि वै धर्मो रतिभोगाश्च केवलाः ।परिचर्या नमस्कारास्तदायत्ता भवन्तु वः ।। १० ।।
महाराज मनु जब स्वर्गको जाने लगे तब उन्होंने स्त्रियोंको पुरुषोंके हाथमें सौंप दिया और कहा — ‘मनुष्यो! स्त्रियाँ अबला, थोड़ेसे वस्त्रोंसे काम चलानेवाली, अकारण हितसाधन करनेवाली, सत्यलोकको जीतने की इच्छावाली (सत्यपरायणा), ईर्ष्यालु, मान चाहनेवाली, अत्यन्त कोप करनेवाली, पुरुषके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाली और भोली-भाली होती हैं। स्त्रियाँ सम्मान पानेके योग्य हैं, अतः तुम सब लोग उनका सम्मान करो; क्योंकि स्त्री जाति ही धर्मकी सिद्धिका मूल कारण है। तुम्हारे रतिभोग, परिचर्या और नमस्कार स्त्रियोंके ही अधीन होंगे ।। ८-१० ।।
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम् ।
प्रीत्यर्थं लोकयात्रायाः पश्यत स्त्रीनिबन्धनम् ।। ११ ।।
सम्मान्यमानाश्ता हि सर्वकार्याण्यवाप्स्यथ ।
‘संतानकी उत्पत्ति, उत्पन्न हुए बालकका लालन-पालन तथा लोकयात्राका प्रसन्नतापूर्वक निर्वाह – इन सबको स्त्रियोंके ही अधीन समझो। यदि तुमलोग स्त्रियोंका सम्मान करोगे तो तुम्हारे सब कार्य सिद्ध होंगे’ ।।
विदेहराजदुहिता चात्र श्लोकमगायत ।। १२ ।। नास्ति यज्ञक्रिया काचिन्न श्राद्धं नोपवासकम् ।
धर्मः स्वभर्तृशुश्रूषा तथा स्वर्ग जयन्त्युत ।। १३ ।।
स्त्रियोंके कर्तव्यके विषयमें विदेहराज जनककी पुत्रीने एक श्लोकका गान किया है, जिसका सारांश इस प्रकार है—स्त्रीके लिये कोई यज्ञ आदि कर्म, श्राद्ध और उपवास करना आवश्यक नहीं है। उसका धर्म है अपने पतिकी सेवा। उसीसे स्त्रियाँ स्वर्गलोकपर विजय पा लेती हैं ।। १२-१३ ॥
जैसे वेद का फल अग्निहोत्र करना है वैसे स्त्री का फल सम्भोग सुख और संतान सुख है। तुलना में देखा जा सकता है कि वेद, शास्त्र, धन तीनों निर्जीव हैं जिसके फल का बखान महाभारत कर रही है, इन निर्जीव वस्तुओं की तुलना स्त्री से की गई है।
अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुवम् ।
रतिपुत्रफला नारी दत्तभुक्तफलं धनम् ।। ६५ ॥ — महाभारत 5/39/65
वेदोंका फल है अग्निहोत्र करना, शास्त्राध्ययनका फल है सुशीलता और सदाचार, स्त्रीका फल है रतिसुख और पुत्रकी प्राप्ति तथा धनका फल है दान और उपभोग ।। ६५ ।।
नारी को उसके शरीर और पति-समर्पण तक सीमित कर देना। नारी का मूल्य केवल उसके पातिव्रत और गर्भधारण क्षमता से नापा जाता है। उसकी बुद्धि, विद्वता, वीरता, स्वतंत्रता—किसी का कोई मूल्य नहीं। यह विचारधारा नारी को केवल पति की संपत्ति और कुल की इज्जत की रक्षक बनाकर रख देती है।
दुराचारिणी स्त्री के लिए विधान: यदि स्त्री “साध्वी” है तो पूजनीय, और यदि “दुराचारिणी” है तो दंडनीय, त्याज्य, अपमानित। यह दोहरा मापदंड है। पुरुष के लिए ऐसा कोई विधान नहीं। पुरुष चाहे जितने विवाह करे, चाहे जितनी स्त्रियों का शोषण करे—वह धर्मात्मा ही रहता है। लेकिन स्त्री एक बार भी पति की आज्ञा का उल्लंघन करे तो वह पतित, त्याज्य, दंडनीय। यह शास्त्र का सबसे बड़ा कुकृत्य है — नैतिकता को लिंग के आधार पर बांटना।
ऋग्वेद: सबसे प्राचीन ग्रंथ, सबसे पुराना नारी-द्वेष
जब मैंने भारतीय संस्कृति के प्राणभूत और प्राचीनतम अभिलेख ऋग्वेद से शुरुआत की, तो जो मिला उसने मुझे झकझोर दिया। ऋग्वेद में लिखा है कि इंद्र ने स्वयं कहा, “स्त्री के मन को शिक्षित नहीं किया जा सकता। उसकी बुद्धि तुच्छ होती है।” (ऋ. 8/33/17)। इसी पुस्तक में अन्यत्र लिखा है: “स्त्रियों के साथ मैत्री नहीं हो सकती। इनके दिल लकड़बग्घों के दिलों से क्रूर होते हैं।” (ऋ. 10/95/15)
हिन्दुओं का सर्वोच्च ग्रंथ वेद स्त्रियों को वस्तु के समान देखता है। जैसे निर्जीव भूमि का कार्य पेड़-पौधों को उत्पन्न करना होता है वैसे ही स्त्री का काम बच्चा पैदा करना है।
ताम् पूषन् शिवतमाम् एरयस्व यस्याम् बीजम् मनुष्याः वपन्ति।
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प्रत्येक शब्द का संस्कृत व्याकरण के आधार पर विश्लेषण
व्याकरण: 'तद्' सर्वनाम (स्त्रीलिङ्ग), द्वितीया विभक्ति, एकवचन।
अर्थ: उस (वधू/स्त्री) को।
व्याकरण: 'पूषन्' प्रातिपदिक (पुल्लिङ्ग), सम्बोधन प्रथमा, एकवचन।
अर्थ: हे पूषा देव! (हे पोषक/परिपुष्ट पति)।
व्याकरण: 'शिव' + 'तमप्' (उत्तमावस्था) + 'टाप्' (स्त्रीलिङ्ग), द्वितीया विभक्ति, एकवचन।
अर्थ: अतिशय कल्याणमयी / परम मङ्गलमयी (स्त्री) को।
व्याकरण: 'आङ्' उपसर्ग + 'ईर्' धातु + णिच् + लोट् लकार (मध्यम पुरुष, एकवचन, आत्मनेपद)। गुण सन्धि: 'आ + ईरयस्व'।
अर्थ: प्रेरित करो / प्रवृत्त करो / भेजो।
व्याकरण: 'यद्' सर्वनाम (स्त्रीलिङ्ग), सप्तमी विभक्ति, एकवचन (अधिकरण कारक)।
अर्थ: जिस (स्त्री) में।
व्याकरण: 'बीज' प्रातिपदिक (नपुंसकलिङ्ग), द्वितीया विभक्ति, एकवचन (कर्म कारक)।
अर्थ: संतानोत्पादक बीज / वीर्य को।
व्याकरण: 'मनुष्य' प्रातिपदिक (पुल्लिङ्ग), प्रथमा विभक्ति, बहुवचन (कर्ता कारक)।
अर्थ: मनुष्य / पुरुषगण।
व्याकरण: 'वप्' धातु (बीजसंताने), लट् लकार (वर्तमान काल), प्रथम पुरुष, बहुवचन।
अर्थ: बोते हैं / आधान करते हैं।
व्याकरण: 'यद्' सर्वनाम (स्त्रीलिङ्ग), प्रथमा विभक्ति, एकवचन (कर्ता कारक)।
अर्थ: जो (स्त्री/पत्नी)।
व्याकरण: 'अस्मद्' सर्वनाम, चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन (सम्प्रदान कारक)।
अर्थ: हमारे लिए।
व्याकरण: 'ऊरु' प्रातिपदिक (पुल्लिङ्ग), द्वितीया विभक्ति, द्विवचन (कर्म कारक)।
अर्थ: दोनों जांघों को।
व्याकरण: 'वश्' धातु + 'शतृ' प्रत्यय + 'ङीप्' (स्त्रीलिङ्ग), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
अर्थ: कामना करती हुई / सकाम / अनुराग रखती हुई।
व्याकरण: 'वि' उपसर्ग + 'श्रि' धातु + लेट् लकार (वैदिक), प्रथम पुरुष, एकवचन।
अर्थ: विवृत करती है / फैलाती है / खोलती है।
व्याकरण: 'यद्' सर्वनाम (स्त्रीलिङ्ग), सप्तमी विभक्ति, एकवचन।
अर्थ: जिसमें।
व्याकरण: 'वश्' धातु + 'शतृ' प्रत्यय (पुल्लिङ्ग), प्रथमा विभक्ति, बहुवचन।
अर्थ: कामना करते हुए / सकाम (हम पुरुष)।
व्याकरण: 'प्र' उपसर्ग + 'हृ' धातु + विधिलिङ् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन।
अर्थ: प्रविष्ट करें / समागम करें।
व्याकरण: 'शेप' प्रातिपदिक, द्वितीया विभक्ति, एकवचन (निरुक्त ३.२१: "शेपः शिश्नं शपतेः स्पृशतिकर्मणः")।
अर्थ: पुरुष जननेन्द्रिय / शिश्न।
हे परिपुष्ट पति! तू प्रेरित कर, जनित्री शक्ति को बोते हैं जो शिवस्वरूपा कल्याणमयी उस पृथिवीरूपा जिसमें कि पुरुष कामना वाली हमारे लिए जांघों को खोल देती है और कामना वाले हम पुरुष जिसमें पुरुषेन्द्रिय का प्रहार करें।
साधारण स्त्री से १० बच्चे पैदा करने चाहिए (ऋग्वेद १०.८५.४५)। १०.८६.२३ में कहा कि जो स्त्री २० बच्चे पैदा करती है वो कल्याणकारी है, अर्थात उसकी प्रशंसा की जा रही है। गीता प्रेस ने अपने नारी अंक में इसी मन्त्र का अर्थ लिखा है – “बीस सन्तति होनेपर भी जिसके शरीर में विकृति न आवे, वह स्त्री महत्त्वशालिनी है (१० । ८६ । २३)”। सायण ने इसी मन्त्र का अर्थ करते हुए लिखा है — “मानवी मनोर्दुहितेयं विंशतिं विंशतिसंख्याकान् पुत्रान् साकं सह ससूव अजीजनत्। त्यस्यै तस्यै भद्रं भजनीयं कल्याणम् अभूत् भवतु” — अर्थात यह मानवी, मनु की पुत्री, बीस-बीस अर्थात् बीस की संख्या वाले पुत्रों को एक साथ जन्म देती है। उसके लिए कल्याणकारी (भद्र) हो।
मनुस्मृति में लिखा है –
प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टाः सन्तानार्थं च मानवाः (९.९६)
गर्भधारण करके सन्तानों की उत्पत्ति करने के लिए स्त्रियों की रचना हुई है और गर्भाधान करने के लिए पुरुषों की रचना हुई है।
क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान्। क्षेत्रबीजसमायोगात्सम्भवः सर्वदेहिनाम् ॥ ९.३३ ॥
स्त्री को भूमि या खेत के तुल्य माना है और पुरुष को बीज के तुल्य माना है। भूमि और बीज अर्थात् स्त्री और पुरुष के बीज मिलने से सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है ॥ ३३ ॥
इस प्रकार शास्त्रों ने बच्चा पैदा करना ही एकमात्र महत्वपूर्ण स्त्री का कर्म बताया है तथा अधिक बच्चे करने को प्रशंसा के योग्य बताया है। इससे ये नहीं समझना चाहिए कि स्त्री के अन्य कर्म शास्त्रों ने नहीं बताये, पर ये सबसे महत्वपूर्ण हैं। स्त्री के शरीर को खेत तथा पुरुष के वीर्य को बीज बताया है। ध्यान देने योग्य बात है कि पुरुष के शरीर की कहीं भी निर्जीव वस्तु से तुलना नहीं की है।
महिलाओं की सृष्टि किस उद्देश्य से हुई है?
श्रुति बोलती है कि वीर्य की स्थापना अर्थात संभोग के उद्देश्य से ही स्त्री का निर्माण किया गया है।
स ह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्त्रियः ससृजे ता सृष्ट्वाध उपास्त तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत्तेनैनामभ्यसृजत ॥ २ ॥ — बृहदारण्यक उपनिषद्
सुप्रसिद्ध प्रजापतिने विचार किया कि मैं इस वीर्यकी स्थापनाके लिये किसी योग्य प्रतिष्ठा (आधार भूमि) का निर्माण करूँ, अतः उन्होंने स्त्रीकी सृष्टि की। उसकी सृष्टि करके उन्होंने उसके अधोभागकी उपासना की (मैथुनकर्मका विधान किया); अतः स्त्रीके अधोभागकी उपासना (सेवन) करे। प्रजापतिने इस उत्कृष्ट गतिशील प्रस्तरखण्ड-सदृश शिश्नेन्द्रियको (उत्पन्न करके उसे) स्त्रीकी (योनिकी) ओर प्रेरित किया, उससे इस स्त्रीका संसर्ग किया ॥ २ ॥
मैं इसे केवल स्त्री-विरोधी उक्ति नहीं मानता, यह नफरत का धर्मीकरण है। जिस देवता को पूजा जाता है, वही देवता स्त्री को बुद्धिहीन और क्रूर कहता है। नारी को मानवीय बुद्धि से वंचित घोषित करना, और उसके शरीर को केवल भोग और प्रजनन की वस्तु बनाना।
अथर्ववेद: सती प्रथा और स्त्री-शरीर की वस्तु-तुलना
अथर्ववेद के एक मंत्र (18/3/1) से मुझे ज्ञात हुआ कि स्त्रियों को पुसला कर, परंपरा की दुहाई देकर और प्राचीन धर्मों का नाम लेकर मृत पति के साथ जिंदा जलने के लिए कहा जाता रहा है। इस मंत्र पर माधवाचार्य का प्राचीन भाष्य उपलब्ध है। (चतुर्वेदसंस्कृतरचनावली: प्रथम भाग, पृ. 224-25)
यह केवल प्रथा नहीं, संगठित हत्या है। धर्म के नाम पर स्त्री को जिंदा जलाना—इससे बड़ा कुकृत्य क्या हो सकता है? और यह कुकृत्य शास्त्रों से वैधता पाता रहा। सती प्रथा का यह प्राचीनतम प्रमाण मुझे सिद्ध करता है कि नारी को जीवन का अधिकार भी नहीं था।
बृहदारण्यक उपनिषद: स्त्री को दंड और बलपूर्वक संभोग का विधान
उपनिषद में भी स्त्री को वस्त्र आभूषण आदि देकर प्रश्न कर उससे काम निकलवाने की बात आई है लेकिन जब स्त्री इसके बाद में अपने पति की बात मानने से इंकार कर दे तो उसे दण्डित करने का आदेश भी दिया है—
सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिन्द्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ — बृहदारण्यकोपनिषद् ६.४.७
वह पत्नी यदि इस पतिको मैथुन न करने दे तो पति उसे उसकी इच्छाके अनुसार वस्त्र, आभूषण आदि देकर उसके प्रति अपना प्रेम प्रकट करे। इतनेपर भी यदि वह इसे मैथुनका अवसर न दे तो वह पति इच्छानुसार दण्डका भय दिखाकर उसके साथ बलपूर्वक समागम करे। यदि यह भी सम्भव न हो तो कहे ‘मैं तुझे शाप देकर दुर्भगा (वन्ध्या) बना दूँगा।’ ऐसा कहकर वह उसके निकट जाय और ‘मैं अपनी यश-स्वरूप इन्द्रियद्वारा तेरे यशको छीने लेता हूँ।’ इस मन्त्रका उच्चारण करे। इस प्रकार शाप देनेपर वह अयशस्विनी (वन्ध्या अथवा दुर्भगा) हो ही जाती है ॥ ७ ॥
आदि शंकर जो उपनिषद के सबसे प्राचीन भाष्यकार हैं, उन्होंने इसी मंत्र पर भाष्य करते हुए लिखा है — वह पत्नी यदि इस पतिको मैथुन न करने दे तो वह आभूषण आदिके द्वारा उसपर अपना प्रेम प्रकट करे। यदि ऐसा करनेपर भी वह मैथुन का अवसर न दे तो पति अपनी इच्छा के अनुसार दण्ड का भय दिखाकर उसके साथ बलपूर्वक मैथुनके लिये प्रयत्न करे। [यह भी सम्भव न हो तो] ‘मैं तुझे शाप दे दूँगा, दुर्भगा (वन्ध्या अथवा भाग्यहीना) बना दूँगा’ ऐसा कहकर ‘मैं अपने यशोरूप इन्द्रियसे तेरे यश को छीन लेता हूँ’ इस मन्त्रका पाठ करते हुए उसके पास जाय। उस अभिशापसे वह ‘दुर्भगा’ एवं ‘वन्ध्या’ कही जानेवाली अयशस्विनी ही हो जाती है ॥ ७ ॥
नारी की अस्मिता को उसकी सहमति के बिना ही छीन लेना, और धर्म के नाम पर बलात्कार को वैध ठहराना। इससे बड़ा अमानवीय कृत्य क्या हो सकता है?
ब्राह्मण ग्रंथ: ऐतरेय ब्राह्मण
वेदों के बाद, उनके व्याख्यान रूप, ब्राह्मण ग्रंथ आते हैं। इनमें एक ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ नाम का ग्रंथ है जिसका रचनाकाल 2500 ई.पू. बताया जाता है। (रामगोविंद त्रिवेदी रचित ‘वैदिक साहित्य’, पृ. 520)। इस पुस्तक में हरिश्चंद्र-नारद संवाद में नारद कहता है:
‘कृपणं ह दुहिता।’ — ए. बा. 7/3/1
अर्थात पुत्री कष्टप्रदा, दुखदायिनी होती है। पुत्री नारी का ही एक रूप है। उसके एक रूप के प्रति जो तिरस्कारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है, वही उसके समग्र के प्रति भी समझना चाहिए।
‘ऐतरेय ब्राह्मण’ के उक्त अंश पर भाष्य करते हुए एक पुराने विद्वान भाष्यकार, सायणाचार्य ने एक प्राचीन श्लोक उद्धृत किया है:
“संभवे स्वजनदुःखकारिका संप्रदानसमयेऽर्थहारिका।
यौवनेऽपि बहुदोषकारिका दारिका हृदयदारिका पितुः॥”
अर्थात जब कन्या उत्पन्न होती है, तब स्वजनों को दुख देती है, जब इसका विवाह करते हैं, तब यह धन का अपहरण करती है। युवावस्था में यह बहुत सी गलतियां कर बैठती है, इसलिए दारिका अर्थात लड़की पिता के हृदय को चीरने वाली कही गई है—‘हृदयदारिका पितुः’।
कन्या के जन्म को ही दुख और धन की चोरी बताना। जिस समाज में बेटी का जन्म शोक माना जाए, वहां नारी की पूजा की बात केवल मजाक है।
यास्काचार्य का निरुक्त
ईसा से लगभग 800 वर्ष पहले आचार्य यास्क ने ‘निरुक्त’ नाम की एक पुस्तक लिखी थी। उसका वैदिक साहित्य में बहुत ऊंचा स्थान है। इसमें नारी के एक रूप, बेटी के विषय में लिखा है: ‘बेटी को दुहिता इसलिए कहा जाता है कि वह ‘दुहिता’ (बुरा करने वाली) और ‘दूरेहिता’ (उससे दूर रहने पर ही भलाई) है। वह ‘दोग्धा’ (मातापिता के धन को चूसने वाली) है।’ (निरुक्त, अ. 3, ख. 4)।
इसी पुस्तक के अगले अध्याय में ‘कन्या’ शब्द की निरुक्ति देते हुए आचार्य यास्क ने लिखा है: “कन्या को कन्या कहने का मतलब यह है कि ज्यों ही वह पैदा होती है, त्यों ही यह चिंता उत्पन्न होने लगती है कि इसे किसके गले मढ़ेंगे: ‘क्वेयं नेतव्या।’” (निरुक्त 4/15)
यह भाषा-विज्ञान नहीं, पूर्वाग्रह है। शब्दों की व्युत्पत्ति में ही नारी के प्रति घृणा भर दी गई। यह मुझे सिद्ध करता है कि नारी के जन्म को ही कलंक माना जाता था।
मनुस्मृति: पितृसत्ता का संविधान
अब मैं ‘मनुस्मृति’ के कुछ श्लोक प्रस्तुत करता हूँ जिनसे मनु के नारी विषयक विचार पूर्णतः स्पष्ट हो जाएंगे और सामान्य व्यक्ति को ज्ञात हो जाएगा कि जहां नारियों की पूजा होती है....कह कर उसकी प्रशंसा करने वाले मनु की, नारियों के प्रति कैसी राय थी।
- पुरुषों को खराब करना स्त्रियों का स्वभाव ही है, अतः बुद्धिमानों को इनसे बचना चाहिए। (2/213)
- पुरुष विद्वान हो, चाहे अविद्वान, स्वयं उसे बुरे रास्ते पर डाल देती हैं। (2/214)
- चाहे माता हो, चाहे बहन हो, चाहे अपनी लड़की हो, इनके पास एकांत में नहीं बैठना चाहिए। इंद्रियां कई बार विद्वानों को भी खींच कर बुरे रास्ते पर ले जाती हैं। (2/215)
- ललाई लिए भूरे रंग वाली, छः उंगलियों वाली, ज्यादा बालों वाली, बिना बालों वाली, ज्यादा बोलने वाली स्त्री के साथ विवाह न करे। (3/8) (वे क्या करें? क्या मातापिता उन्हें सारी उमर घर में रख सकेंगे? क्या वे आत्महत्या कर लें? क्या वे पेशा करने वाली वेश्याएं बन जाएं?)
- जिनका कोई भाई न हो, उसके साथ विवाह न करे। (3/11) (इसमें उस बेचारी लड़की का क्या कसूर है कि उसका कोई भाई नहीं है?)
- पुरुषों को दिन-रात स्त्रियों की देखभाल करनी चाहिए। (9/2)
- कुमारावस्था में पिता उसकी देखभाल करता है, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र। नारी स्वतंत्र नहीं की जानी चाहिए। स्त्रियों को जरा-जरा सी बातों से बचाना चाहिए, नहीं तो दोनों कुलों की बदनामी होती है। (9/3,5)
- स्त्रियों को घर के कामों और धर्म के कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए ताकि वे खाली समय प्राप्त न कर सकें। (9/11)
- स्त्रियों को बचा कर रखना चाहिए। वे सुंदर या कुरूप का भी ध्यान नहीं करतीं। वे किसी भी पुरुष की हो जाती हैं। (9/14)
- स्त्रियों में क्रोध, कुटिलता, द्वेष और बुरे कामों में रुचि स्वभाव से ही होती है। (9/17)
- स्त्रियों के संस्कार वेदमंत्रों से नहीं करने चाहिए। वे मूर्ख होती हैं। वे अशुभ होती हैं। (9/18)
- विधवा स्त्री का दोबारा विवाह नहीं करना चाहिए। यदि किया जाए तो धर्म का नाश होगा। (9/64)
- यदि सगाई के बाद ही भावी पति मर जाए, कन्या को उस (पति) के छोटे भाई से ब्याह दे। (9/69)
मनुस्मृति तथा अन्य स्मृतियों में स्त्रियों के दायभाग के विषय में जो पक्षपातपूर्ण विधान उपलब्ध हैं, वे मुझमें कठोरता जागृत करते हैं। ‘लेक्चर्स ऑन धर्मशास्त्र’ के पृष्ठ 42 से 63 तक पढ़ कर मैंने संक्षेप में इस विषय में जानकारी प्राप्त की। उस समय स्त्रियों को अचल संपत्ति का अधिकार प्राप्त नहीं था।
यह शास्त्र नहीं, स्त्री-द्वेष का संविधान है। मनु जो “यत्र नार्यस्तु पूज्यते” कहता है, वही मनु स्त्री को स्वतंत्रता से वंचित करता है, उसे मूर्ख और अशुभ कहता है, विधवा के पुनर्विवाह पर धर्म-नाश का ठप्पा लगाता है, और संपत्ति से बेदखल करता है। यह पूरा पाखंड है। मनुस्मृति को पवित्र मानना उस अपराध में भागीदारी है। इसकी कड़ी निंदा होनी चाहिए।
रामायण: पूजा नहीं, अपमान
कालक्रम से अब मैं हिंदुओं की बाइबिल ‘रामायण’ की ओर बढ़ता हूँ। ‘रामायण’ में नारी को मानवीय स्तर पर न लेकर अमानवीय स्तर पर ज्यादा लिया गया है। उसके चरितनायक के पिता दशरथ का तीन-तीन स्त्रियों से विवाह करना मुझे यह घोषित करता है कि तत्कालीन संस्कृति में नारी पुरुष की संपत्ति थी, उसकी विलासभूमि थी। यदि इस तथ्य को छुपाने के लिए कोई यह कहे कि संतान प्राप्ति के लिए तीन बार शादी की गई तो भी बात बनती नहीं। जिस गुरु के आशीर्वाद से तीन स्त्रियों में संतानोत्पत्ति हो सकती है, वही गुरु पहले भी, पहली ही रानी में, ऐसा कर सकता था। यह बात नहीं है कि दूसरे विवाह की अनुमति कुलगुरु ने ली गई हो।
कोटि-कोटि भारतीय जनता की श्रद्धा का पात्र सीता के साथ भी यही कुछ किया गया। रावण से सीता को मुक्त करा कर भारतीय संस्कृति के प्रतीक राम ने उसके साथ सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव नहीं किया, प्रत्युत उसे अग्निपरीक्षा के लिए बाध्य किया।
जिस बात की आशंका थी, राम ने वह भी कुछ समय बाद कर दिखाया। एक धोबी के घर से गुप्त रूप में सुने व सीता पर लगाए गए लांछन को लेकर राम ने उसे अर्थात सीता को निर्वासित कर दिया। राम के इस उपेक्षापूर्ण आचरण का समाधान प्रस्तुत करते हुए रामभक्त कहते हैं कि राम का यह पग सिद्ध करता है कि वह अपनी प्रजा के एक छोटे से नागरिक की भावना का भी ध्यान रखते थे। उनके मन में राम का यह आचरण भारतीय राजतंत्र का उज्ज्वल रूप प्रस्तुत करता है, परंतु मुझे उनका कथन राम के चरित्र को हास्यास्पद बनाता प्रतीत होता है। उर्मिला के विषय में लक्ष्मण की उपेक्षा भी यही सिद्ध करती है कि उस समय नारी से मानवीय स्तर पर व्यवहार नहीं किया जाता था।
नारी की अस्मिता को अग्नि में जलाना, गर्भवती पत्नी को जंगल में छोड़ना, और इसे “राजधर्म” कहना। रामराज्य का यह असली चेहरा है।
महाभारत: नारी को दांव पर लगाने वाला धर्म
‘महाभारत’ की नारी की स्थिति भी मुझे रामायण की नारी की स्थिति से अच्छी नहीं लगती। ‘महाभारत’ के चरितनायकों का चरित्र इस विषय में सबसे प्रथम आता है। उन्होंने नारी को विलास का साधन माना। इस आचरण को औचित्य प्रतिपादित करने के लिए ‘महाभारत’ में कई समाधान दिए गए हैं, जो ‘पौराणिक समाधान’ के सिवाय कुछ नहीं। कुमारिल भट्ट ने पांचों पांडवों के इंद्रांश होने की कल्पना की और लिखा कि पांचों पांडव मिल कर एक इंद्र बनता है, अतः पांचों से उपभुक्त द्रौपदी एक ही इंद्र से उपभुक्त है। मुझे ये पौराणिक समाधान बेहद दुर्बल लगते हैं!
जरा सब कुछ हार कर युधिष्ठिर द्रौपदी को दांव पर लगा कर उसे भी हार बैठता है। जब द्रौपदी को दुर्योधन के दरबार में उपस्थित करने के लिए दुशासन रामराज्य में पहुंचता है तो वह चिल्ला उठती है, “जुए में मुझे चूके पुरुष का पास एगा कौन सा अधिकार है कि वह अपनी पत्नी को दांव पर लगा दे और उसको दूसरों की गुलाम बना दे?” उसका यह चीखारा मुझे तत्कालीन शोषित नारी के चित्र को प्रतिबिंबित करता दिखता है।
भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य जैसे महाज्ञानी दरबार में मौन बैठे रहे। यह शास्त्र का कुकृत्य है—नारी को जुए की वस्तु बनाना और धर्म के ठेकेदारों का मौन। महाभारत का युद्ध भी इसी अपमान का परिणाम था, परंतु उसका दोष नारी पर मढ़ा गया।
कौटिल्य और चाणक्यनीति: राजनीति में नारी-द्वेष
भारतीय इतिहास में कौटिल्य और उसके प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ का कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण स्थान है। अतः ऐसे आचार्य के नारी विषयक विचार जानने की उत्सुकता मुझमें भी उत्पन्न हुई। ‘चाणक्यनीतिदर्पण’ में चाणक्य ने लिखा:
- “अग्नि, पानी, स्त्री, मूर्ख व्यक्ति, सर्प और राजा से सदा सावधान रहना चाहिए। क्योंकि ये सेवा करते-करते ही उलटे फिर जाते हैं अर्थात प्रतिकूल हो कर प्राण हर लेते हैं।” (14/12)
- “स्त्रियां एक के साथ बात करती हुई दूसरे की ओर देख रही होती हैं और दिल में किसी तीसरे का चिंतन हो रहा होता है। इन्हें किसी एक से प्यार नहीं होता।” (16/2)
- “स्त्रियां कौन सा दुष्कर्म नहीं कर सकतीं?” (10/4)
- “झूठ, दुस्साहस, कपट, मूर्खता, लालच, अपवित्रता और निर्दयता स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं।” (2/1)
स्त्री को अग्नि, सर्प और राजा के साथ रखना—मुझे यह शास्त्र का अपमान लगता है। चाणक्य जैसे कूटनीतिज्ञ भी नारी-द्वेष से मुक्त नहीं थे। यह सिद्ध करता है कि पितृसत्ता केवल धर्म तक सीमित नहीं थी, राजनीति और नीति में भी बसी हुई थी।
अवधूत गीता: नारी को साक्षात् नरक कहने वाला ग्रंथ
अवधूत गीता में नारी के विषय में जो कहा गया है, वह केवल घृणा नहीं, विक्षिप्तता है:
कौटिल्यदम्भसंयुक्ता केनापि निर्मिता नारी बन्धनं सत्यशौचविवर्जिता । सर्वदेहिनाम् ॥ १४ ॥
कुटिलता तथा दम्भसे युक्त और सत्य तथा पवित्रतासे रहित एवं सभी देहधारियोंकी बन्धनस्वरूपा नारीको किसने बना दिया? ॥ १४ ॥
त्रैलोक्यजननी धात्री सा भगी नरकं ध्रुवम् । तस्यां जातो रतस्तत्र हा हा संसारसंस्थितिः ॥ १५ ॥
जो स्त्री तीनों लोकोंकी जननी और पोषण करनेवाली है, वह भगयुक्त होनेसे निश्चय ही साक्षात् नरक है। उसी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ मनुष्य पुनः उसीका भोग करता है, महान् खेद है कि संसारकी यही स्थिति है ॥१५॥
जानामि नरकं नारीं ध्रुवं जानामि यस्यां जातो रतस्तत्र पुनस्तत्रैव बन्धनम् । धावति ॥ १६ ॥
मैं स्त्रीको [साक्षात्] नरक समझता हूँ और इसे निश्चितरूपसे बन्धन मानता हूँ; क्योंकि स्त्रीसे उत्पन्न हुआ मनुष्य उसीमें आसक्त हो जाता है और बार-बार उसीकी ओर दौड़ता है ॥ १६॥
भगादिकुचपर्यन्तं संविद्धि नरकार्णवम् । ये रमन्ति पुनस्तत्र तरन्ति नरकं कथम्॥ १७॥
योनिसे लेकर स्तनपर्यन्त स्त्रीको नरकका समुद्र समझो। जो लोग [उसीसे उत्पन्न होकर] पुन: उसीमें रमण करते हैं, वे नरकको किस प्रकार तर सकते हैं? ॥ १७ ॥
विष्ठादिनरकं घोरं भगं च किमु पश्यसि रे चित्त कथं परिनिर्मितम् । तत्रैव धावसि ॥ १८ ॥
स्त्रीकी योनि विष्ठा आदिसे युक्त घोर नरकस्वरूप बनायी गयी है। हे चित्त! तुम उसे क्यों देखते हो और उसकी ओर क्यों दौड़ते हो?॥१८॥
अन्तरे नरकं विद्धि कौटिल्यं ललितामिह पश्यन्ति बाह्यमण्डितम् । महामन्त्रविरोधिनीम् ॥ २१ ॥
स्त्रीके देहके भीतर नरक विद्यमान है - ऐसा जानो; जो कुटिलतासे युक्त है, किंतु बाहरसे शोभायुक्त लगता है। बुद्धिमान् (लोग) इस लोकमें स्त्रीको महामन्त्रस्वरूप वैराग्यका शत्रु समझते हैं॥२१॥
अज्ञात्वा जीवितं लब्धं भवस्तत्रैव देहिनाम् । अहो जातो रतस्तत्र अहो भवविडम्बना ॥ २२ ॥
आत्माको न जान करके ही मनुष्यने पुनः जन्म प्राप्त किया; देहधारियोंका जन्म उसी स्त्रीसे हुआ। महान् आश्चर्य है कि वह पुन: उसीमें आसक्त हो गया; अहो, संसारकी ऐसी विडम्बना है ॥ २२ ॥
तत्र मुग्धा रमन्ते ते यान्ति नरकं घोरं च सदेवासुरमानवाः। सत्यमेव न संशयः ॥ २३ ॥
देवता, असुर तथा मानवसमेत सभी मूढ़ बुद्धिवाले लोग उसी स्त्रीमें रमण करते हैं और [परिणामस्वरूप] वे घोर नरकमें जाते हैं, यह सत्य है; इसमें सन्देह नहीं है ॥२३॥
अग्निकुण्डसमा संसर्गेण नारी विलीयेत घृतकुम्भसमो तस्मात्तां नरः । परिवर्जयेत्॥ २४॥
स्त्री अग्निके कुण्डके समान है और पुरुष घृतके कुम्भके समान है। नारीके सम्बन्धसे पुरुषका विलय हो जाता है; अतः उसका त्याग कर देना चाहिये ॥ २४ ॥
गौडी पैष्टी तथा माध्वी विज्ञेया त्रिविधा सुरा । चतुर्थी स्त्री सुरा ज्ञेया ययेदं मोहितं जगत् ॥ २५ ॥
गुड़, जौ तथा महुएकी बनी हुई तीन प्रकारकी मदिरा जाननी चाहिये; किंतु स्त्रीको चौथी मदिरा समझना चाहिये, जिसके द्वारा यह जगत् उन्मत्त कर दिया गया है ॥ २५ ॥
मद्यपानं महापापं नारीसङ्गस्तथैव च। तस्माद् द्वयं परित्यज्य तत्त्वनिष्ठो भवेन्मुनिः ॥ २६ ॥
मद्यका पान करना महान् पाप है, उसी तरह स्त्री-संसर्ग भी महान् पाप है। अतः इन दोनोंका त्याग करके मुनिको तत्त्वज्ञानसे युक्त होना चाहिये ॥ २६ ॥
यह शास्त्र का सबसे घृणित कुकृत्य है — नारी को, जो जननी है, जो सृष्टि का आधार है, उसे साक्षात् नरक कहना। यह केवल नारी-द्वेष नहीं, यह मानसिक विकृति है। इसकी कड़ी निंदा होनी चाहिए।
भर्तृहरि: छठी शताब्दी
छठी शताब्दी में भर्तृहरि नामक एक राजा हुआ है, जो एक कवि, नीतिवेत्ता और योगी के रूप में विख्यात है। उसने अपने ‘शृंगारशतक’ और ‘वैराग्यशतक’ में स्त्रियों के लिए बहुत घटिया किस्म के विशेषण प्रयुक्त किए हैं, उनकी बहुत भर्त्सना की है और उन्हें बहुत नीच सिद्ध करने का प्रयास किया है। उसने ‘शृंगारशतक’ के 76वें पद्य में लिखा है:
“स्त्री संशयों का भंवर, उद्दंडता का घर, उचित-अनुचित काम की शौकीन, बुराइयों की जड़, कपटों का भंडार, अविश्वास की पात्र होती है। महापुरुषों को सब बुराइयों से भरपूर स्त्री से दूर रहना चाहिए। न जाने धर्म का संहार करने के लिए स्त्री की सृष्टि किसने कर दी!”
यह शास्त्र का कुकृत्य है — नारी को संशय, उद्दंडता, कपट और अविश्वास का प्रतीक बताना। यह केवल कविता नहीं, नफरत का प्रचार है। इसकी कड़ी निंदा होनी चाहिए।
शंकराचार्य: आठवीं शताब्दी
आठवीं सदी के महान हिंदू दार्शनिक शंकराचार्य ने स्त्रियों के विषय में जो विचार अभिव्यक्त किए हैं, उन्हें पढ़ कर मुझे खयाल आता है कि इस अद्वैतवादी की अकल को क्या हो गया था! अपनी ‘प्रश्नोत्तरी’ में उसने स्पष्ट लिखा है कि नारी नरक का द्वार है। जो व्यक्ति अद्वैत का उपदेश देता है, जो कहता है कि आत्मा और ब्रह्म एक हैं, वही व्यक्ति नारी को नरक का द्वार कहता है। यह द्वंद्व ही इस बात का प्रमाण है कि शास्त्रों का नारी-विषयक ज्ञान केवल पितृसत्तात्मक स्वार्थ की पुष्टि करता है।
पुराण: अमानवीयता की पराकाष्ठा
पुराणसाहित्य में मुझे बहुत से ऐसे प्रकरण उपलब्ध हुए हैं जिनमें बाल विधवाओं को सिर मुंडवा कर और श्वेत वस्त्र पहन एकांत में रहने के आदेश दिए गए हैं। भागवत पुराण में तो यहां तक लिखा है कि पति चाहे लंगड़ा हो, चाहे अंधा, चाहे कुबड़ा हो, चाहे कोढ़ी, स्त्री को उसे छोड़ने का अधिकार नहीं है।
यह केवल अमानवीयता नहीं, जीवित मृत्यु है। बाल विधवाओं का सिर मुंडवाना, उन्हें श्वेत वस्त्र पहनाना, समाज से बहिष्कृत करना—यह सब शास्त्रों के आदेश पर हुआ। पति कोढ़ी हो तो भी स्त्री को उसके साथ बंधी रहना पड़े, यह कैसा धर्म? यह धर्म नहीं, नारी के जीवन का अपहरण है।
कबीर: पंद्रहवीं शताब्दी
तेरहवीं शताब्दी के बाद संत कबीर जैसे मार्गदर्शकों ने बहुत प्रभावशाली ढंग से परिवर्तन का चक्र चलाया, परंतु उनके स्त्री विषयक विचार वही रहे जो भर्तृहरि और शंकर के थे। कबीर ने लिखा है:
“नारी तो हम हू करी, कौन्हा नहीं विचार।
जब जानी तब पिरहरी, नारी सकल विकार॥”
“नारी की झाईं परत, अंधा होत भुजंग।
कबिरा तिन की क्या गति, तिन नारी के संग॥”
कबीर, जो मूर्तिपूजा के विरोधी थे, जो जाति-पाति के विरोधी थे, वे भी नारी-द्वेष से मुक्त नहीं थे। उन्होंने नारी को "सकल विकार" और "अंधा करने वाला भुजंग" कहा। यह सबसे बड़ा कुकृत्य है—सुधारक भी नारी-द्वेष में डूबे हुए थे। यह धर्म का पाखंड है। इसकी कड़ी निंदा होनी चाहिए।
तुलसीदास: सोलहवीं शताब्दी
तुलसीदास के नारी-विषयक विचार मुझे नितांत निम्नस्तर के लगते हैं। वह लिखता है:
“ढोल गंवार शूद्र पसु नारी, ये सब ताडन के अधिकारी।”
तुलसीदास ने नारी को ढोल, गंवार, शूद्र और पशु के साथ रखा—अर्थात ताड़ना का अधिकारी। यह केवल कविता नहीं, नारी को पशु से भी नीचे गिराने का प्रयास है। यह शास्त्र का कुकृत्य है — नारी को मनुष्य की श्रेणी से बाहर कर देना। इसकी कड़ी निंदा होनी चाहिए।
पंचतंत्र
पंचतंत्र आदि प्रसिद्ध ग्रंथों में मुझे ऐसी कथाएं विद्यमान मिलीं जिनका उद्देश्य नारी को मूर्ख और मूढ़ सिद्ध करना है। पंचतंत्र, जो चौथी शताब्दी ई. की रचना मानी जाती है, में ‘रंडा’ शब्द वेश्या के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है:
रंडे पॉडतमानिन — 1/392
प्रबोधचंद्रोदयनाटकम्: ग्यारहवीं शताब्दी
ग्यारहवीं शताब्दी में रचित संस्कृत के ‘प्रबोधचंद्रोदयनाटकम्’ में ‘रंडा’ शब्द प्रयुक्त हुआ है:
तां रंडां पाखण्डेषु नियोजय — 2/38
इसी नाटक में ‘रंडा’ शब्द विधवा के लिए भी प्रयुक्त हुआ है—
रंडा: पीनपयोधरा: — 3/18
यह सिद्ध करता है कि ‘रंडा’ शब्द पहले वेश्या के लिए प्रयुक्त होता था, बाद में विधवा के लिए। यह कटु तथ्य नारी के प्रति हमारे दृष्टिकोण का ही परिचायक है।
‘रंडी’ और ‘रांड’: भाषा में छिपा अपमान
हमारी भाषा में ‘रंडी’ और ‘रांड’ दो शब्द हैं। ‘रंडी’ का अर्थ ‘शिक्षार्थी हिंदी शब्दकोश’ (पृ. 688) में इस प्रकार लिखा है— ‘1. धन ले कर व्यभिचार करने वाली स्त्री, वेश्या। 2. विधवा।’ यही अर्थ इस शब्द के ‘प्रामाणिक हिंदी कोश’ (पृ. 694) में दिए गए हैं। पंजाबी भाषा में भी ‘रंडी’ शब्द एक साथ विधवा और वेश्या का वाचक माना गया है।
‘रांड’ शब्द भी वेश्या और विधवा दोनों को एक साथ अभिहित करता है। ‘वृहत् हिंदी कोश’ (पृ. 951) में इसका अर्थ इस तरह लिखा है— “बेवा, विधवा, जिस स्त्री का पति मर चुका हो; वेश्या, रंडी।” यही अर्थ ‘प्रामाणिक हिंदी कोश’ के पृष्ठ 704 पर देखे जा सकते हैं।
विधवा और वेश्या के लिए एक ही शब्द का होना विधवा को वेश्या और वेश्या को विधवा समझने के समान है, जो मुझे सर्वथा निंदनीय लगता है। क्या हर विधवा वेश्या होती है? या, क्या हर वेश्या विधवा होती है? फिर दोनों के अंतर को धूमिल करने वाला, दोनों का वाचक एक ही शब्द क्यों रखा गया है? क्या यह हिंदू/भारतीय विधवाओं का अपमान नहीं?
काशी की बाबत एक लोकोक्ति प्रचलित है— ‘रांड सांड सीढ़ी संन्यासी, इनसे बचे तो सेवे काशी।’ यहां काशी में रांडों, सांडों, सीढ़ियों और संन्यासियों की बहुतायत अभिव्यक्त की गई है। परंतु यहां मुझे प्रश्न उठता है कि ‘रांड’ का क्या अर्थ लिया जाए—वेश्या या विधवा? और जो भी अर्थ लिया जाए, वह क्यों लिया जाए अर्थात उसे किस आधार पर स्वीकार किया जाए? ऐसे प्रसंगों में एक निश्चित अर्थ का अभाव मुझे बुरी तरह अखरता है।
ऋग्वेद में ‘विधवेव देवरम्’ (10-40-2) आता है। इसका अर्थ करते हुए स्वामी दयानंद सरस्वती ने लिखा है— “जैसे विधवा स्त्री देवर के साथ संतानोत्पत्ति करती है, वैसे ही तुम भी करो।” फिर उन्होंने निरुक्तकार यास्क के अनुसार ‘देवर’ शब्द का अर्थ बताते हुए लिखा है— “विधवा का जो दूसरा पति होता है, उसको ‘देवर’ कहते हैं।” (देखें, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, नियोग प्रकरण)
मुझे यह समझ नहीं आता कि विधवा और वेश्या को एक ही शब्द द्वारा अभिहित करने के पीछे काम करने वाली मानसिकता विधवा के प्रति अतिशय घृणा से प्रेरित है या प्रच्छन्न कामुकता से। जो भी हो, यह हमारे सांस्कृतिक व मनोवैज्ञानिक जीवन पर एक कलंक से कम नहीं है। इसे हटाए बिना भारतीय/हिंदू विधवाओं के अपमान के नाम पर ‘वाटर’ फिल्म के विरोध में गंगा में डूबकर या अपने को आग लगाकर आत्महत्या करने के प्रयास हमें अपराध बोध से मुक्ति नहीं दिला सकेंगे।
यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि रंडी और रांड का पुल्लिंग रंडवा या रंडुआ है, जो केवल इतना अर्थ देता है—‘वह जिसकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी हो।’ इसके साथ कोई दूसरा अर्थ नहीं जुड़ा हुआ है। होना तो यह चाहिए था कि रंडवा/रंडुआ वेश्यागामी का अर्थ देता, जैसे रांड/रंडी वेश्या का अर्थ देते हैं; परंतु ऐसा नहीं है। क्या ऐसा इसलिए नहीं हो सका कि भाषा भी मर्द की दासी है? या, मर्द ने अपने वाचक शब्द के साथ अपमानजनक अर्थ को श्लिष्ट नहीं होने दिया?
यह भाषा का कुकृत्य है। विधवा को वेश्या कहना, उसके दुख को अपमान में बदलना, और पुरुष के लिए ऐसा अपमानजनक अर्थ न रखना—यह सिद्ध करता है कि भाषा भी पितृसत्ता की दासी बनाई गई। इसकी कड़ी निंदा होनी चाहिए।
निष्कर्ष: पूजा का झूठ, शोषण का सच
यह लेख लिखते हुए मैंने जो पढ़ा, वह केवल शब्द नहीं थे। वह एक ऐसी चीख थी जो हज़ारों वर्षों से दबाई जा रही है। वह एक ऐसा दर्द था जिसे शास्त्रों ने "धर्म" कहकर वैध बना दिया। वह एक ऐसा अपमान था जिसे "संस्कृति" कहकर महिमामंडित कर दिया गया। मैं जब भी मनुस्मृति के वे श्लोक पढ़ता हूँ, जहां स्त्री को मूर्ख, अशुभ, कुटिल और अविश्वासिनी कहा गया है—मुझे वह बच्ची याद आती है जिसका जन्म लेते ही यह कह दिया गया कि यह दुख देने आई है। मुझे वह कन्या याद आती है जिसे "दूरेहिता" कहा गया—अर्थात उससे दूर रहने में ही भलाई है। मुझे वह नववधू याद आती है जिसे समझाया गया कि उसका धर्म केवल पति की सेवा करना है। मुझे वह विधवा याद आती है जिसका सिर मुंडवा दिया गया, जिसे श्वेत वस्त्र पहनाकर समाज से बाहर कर दिया गया, जिसे "रांड" कहकर अपमानित किया गया।
यह नारी वह है जिसे ऋग्वेद में बुद्धिहीन कहा गया। यह नारी वह है जिसे अथर्ववेद में खेत कहा गया—जिसमें पुरुष बीज बोता है। यह नारी वह है जिसे बृहदारण्यक उपनिषद में वीर्य-स्थापन का साधन बताया गया, और यदि वह संभोग से इंकार करे तो उसे बलपूर्वक भोगने का आदेश दिया गया। यह नारी वह है जिसे अवधूत गीता में साक्षात् नरक कहा गया, चौथी मदिरा कहा गया। यह नारी वह है जिसे तुलसीदास ने ढोल, गंवार, शूद्र और पशु की श्रेणी में रखकर ताड़ना का अधिकारी घोषित कर दिया।
और यह सब करने वाले कौन थे? वे, जिन्हें हम "महापुरुष" कहते हैं। वे, जिन्हें हम "ऋषि" कहते हैं। वे, जिन्हें हम "आचार्य" कहते हैं। वे, जिनके नाम पर आज भी मंदिर बने हैं, मूर्तियां सजी हैं, ग्रंथ पूजे जाते हैं। क्या यह धर्म है? जिस धर्म में आधी मानवता को बुद्धिहीन कहा जाए, उसे नरक कहा जाए, उसे खेत कहा जाए, उसे पशु कहा जाए—वह धर्म नहीं, वह अपराध है। क्या यह संस्कृति है? जिस संस्कृति में बेटी का जन्म शोक माना जाए, विधवा को वेश्या कहा जाए, और सती प्रथा को वैध ठहराया जाए—वह संस्कृति नहीं, वह कलंक है।
मैं यह सब लिखते हुए यह भी जानता हूँ कि यह लेख किसी एक स्त्री की कहानी नहीं है। यह उस स्त्री की कहानी है जिसे मनु ने संपत्ति से वंचित किया। यह उस स्त्री की कहानी है जिसे कौटिल्य ने अग्नि, सर्प और राजा के साथ रखा। यह उस स्त्री की कहानी है जिसे शंकराचार्य ने नरक का द्वार कहा। यह उस स्त्री की कहानी है जिसे कबीर ने "सकल विकार" कहा। यह उस स्त्री की कहानी है जिसे हमने कभी मनुष्य माना ही नहीं।
लेकिन आज मैं यह भी कहना चाहता हूँ—यह स्त्री मरी नहीं है। वह आज भी जीवित है। वह आज भी लड़ रही है। वह आज भी उस शास्त्र के खिलाफ खड़ी है जो उसे हीन बताता है। वह आज भी उस धर्म के खिलाफ खड़ी है जो उसे पति की दासी बनाता है। वह आज भी उस संस्कृति के खिलाफ खड़ी है जो उसे पूजा की वस्तु बनाकर उसका अपमान करता है। और मैं उसके साथ हूँ। मैं उस स्त्री के पक्ष में हूँ, शास्त्र के पक्ष में नहीं।
यह शास्त्रों का कुकृत्य है, और इसकी कड़ी निंदा होनी चाहिए। इन ग्रंथों को पवित्र मानना, इनके श्लोकों को दोहराना, और इनके नाम पर नारी को अब भी हीन समझना—यह अपराध है। जिस संस्कृति ने नारी को खेत कहा, नरक कहा, मदिरा कहा, पशु कहा—वह संस्कृति किसी भी सभ्य समाज के कलंक से कम नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने अतीत का तटस्थतापूर्वक मूल्यांकन करें, इन शास्त्रों के नारी-द्वेष को उजागर करें, इनकी कड़ी निंदा करें, और नारी को उसका वास्तविक मानवीय सम्मान प्रदान करें।
काश, इस प्रकार की भ्रामक रचनाएं हमारे यहां न होतीं।
काश, हम नारी को पूजा की वस्तु नहीं, मनुष्य मानते।

1 Comments
What a shallow and biased writer! He claims this is Samālochanā (balanced critique), when it is merely Ālochanā (one-sided criticism) stripped of context and driven by uninformed interpretations. I won’t claim everything in the scriptures is flawless, nor will I use "context" as a blanket excuse. I reject what warrants rejection and uphold what deserves to be upheld, rather than inventing context just to defend the texts. However, much of what is presented above is blatantly misinterpreted.
ReplyDeleteThe scenes from the Ramayana and Mahabharata are entirely stripped of context. Judging ancient practices like polygyny or the socio-economic preference for sons by modern standards is a flawed extrapolation of present-day morality onto the past.
Similarly, Sita was not banished merely because a single washerman objected; the doubt was widespread across society. Rama was not an ordinary citizen—he was the king. Even today, when a minister faces severe public backlash—whether the allegations are true or false—we expect them to step down. Rama had to prioritise his royal duty over his personal role as a husband. It was tragic for Sita, and agonising for Rama, who was forced to choose between two terrible outcomes. As for the Mahabharata, Yudhishthira did not single out Draupadi to wager; he had already gambled away his wealth, his brothers, and himself. Everyone agrees his gambling was a grave mistake—no one justifies it—but it was a personal failing, not targeted misogyny.
Furthermore, spiritual texts—such as the commentaries of Shankara, the Avadhuta Gita, Kabir, and Bhartrihari—are grossly misrepresented. Their sole purpose is to induce Vairāgya (detachment) in spiritual seekers. Because attraction to the opposite sex is a major distraction on the spiritual path, and because both teachers and monastic seekers were predominantly men, these warnings were framed around women. Had the seekers been women, the warnings would have targeted men. These texts were written for Sannyasins (ascetics), not householders, in an era unconcerned with political correctness. Conveniently, you omitted Buddhist and Jain monastic texts, which use the exact same rhetoric for the exact same reasons.
Your reading of literary devices is equally flawed:
The Khet and Beej analogy: An analogy compares specific emphasised traits, not every single attribute of the subjects. By your logic, no analogy could ever function because no two things are identical in every respect.
Conditional reverence: Stating that only a "virtuous woman" is worthy of reverence (pujaniya) is basic common sense. Praise is always conditional on conduct, whether applied to women, men, or anyone else.
Why didn't social texts critique men the same way? Partly because male writers operated within their own frame of reference, and partly due to the prevailing social biases of the era. Was it ideal? Not entirely, but it was far more nuanced than modern socio-political lenses suggest.
You operate under the delusion that present-day morality is the ultimate, final standard for humanity. Even the "progressives" of the last century look flawed by today's standards, and future generations—including women—will undoubtedly critique your current views. Cherry-picking isolated verses, applying a rigid modern lens, and filling in the gaps with your own biases is not Samālochanā—it is premeditated propaganda. "Believe me, sir, I was being entirely neutral and honest, with zero predisposition." Lol.